संतति शास्त्र
Santati Shastra
by पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव
Source: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (origin)
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सन्ततिशास्त्र ।
है। इसलिये शरीरके ही अनुसार धर्म होना चाहिये। इस बातके माननेमें कि गर्भाधान होनेके छ मास बादतक संयोग किया जाय, अनेक वाधार्थ पड़ती हैं। स्त्री और बच्चेका निर्बल हो जाना, गर्भस्त्राव आदि कारणोंसे छ मास तक गर्भवतीसे संयोग करनेका नियम अनुचित है। इसलिये वैद्यक मतके अनुसार दो मासतक यदि इच्छा हो, तो गर्भवतीसे संयोग करना चाहिये।
जो लोग इससे अधिक दिनोंतक त्रिग्य-वासनामें फँसकर संयोग करने हैं उनसे स्त्री और गर्भके बालकको अनेक प्रकारकी हानि उठानी पड़ती है। यहाँतक कि गर्भवती और बालक दोनोंकी जान जाने तककी नौबत आ पहुँचती है।
(४६) गर्भवतीके कर्तव्य ।
आज कल स्त्रियोंकी दशा शोचनीय हो रही है। गर्भवती होनेपर इनका ध्यान अपने कर्तव्योंकी ओर जरा भी नहीं जाता। वे नहीं समझतीं कि गर्भ धारण करनेपर उनपर कितनी जिम्मेदारी आ जाती है। गर्भवतीको हमेशा अपना स्वास्थ्य उत्तम रखनेका यत्न करना चाहिये। प्रायः देखा जाता है कि गर्भवती अपने खानेपीनेपर बहुत कम ध्यान रखती हैं। ऐसी दशामें जहाँ तक हो सोजन मधुर और जल्दी पचनेवाला होना चाहिये। पहलेके दो महीनोंमें भूख कम लगती है, मिट्टी इत्यादि खानेकी रुचि तो अवश्य होती है। यदि इन दिनों थोड़ा सोजन किया जाय तो फोई हानि नहीं है। दो महीनेके पीछे भूख स्वयं बढ़ती है। इसलिये दिनरातमें कई बार थोड़ा थोड़ा सोजन करना चाहिये। चौथा महीना लगनेके साथ ही कुछ अधिक सोजनकी जरूरत पड़ती है। प्रकृति भी इन दिनोंमें