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संतति शास्त्र

संतति शास्त्र

Santati Shastra

by पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव

Source: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (origin)

Devanagarihipublished302 pages

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सन्तति-शास्त्र ।

उत्पन्न न होता । जबतक बात पित्त और कफ विग- कर रजवीर्य और गर्भाशय को न विगाड़ें, तब तक ही असात्य सेवन भी गर्भ उत्पन्न कर सकता है। सात्यसेवी स्त्री पुरुषका रजवीर्य और गर्भाशय शुद्ध होनेपर ऋतु कालमें मिलाप होता है, परन्तु जब तक जीवात्मा प्रवेश न करे तबतक गर्भ नहीं रह सकता । यदि यह कहा जाय कि सात्य से ही गर्भ उत्पन्न होता है, सो नहीं, परन्तु बात यह है कि गर्भ उत्पन्न होनेमें सात्य भी एक कारण है। इससे ये वस्तुएं शरीरमें उत्पन्न होती हैं—आरोग्य, अनास्यता, नीला- भता, इन्द्रियाँकी प्रसन्नता, स्वरसम्यक्ता, वीजसम्यक्- ता और हर्षकी अधिकता । ये सब सात्यसे उत्पन्न होती हैं । (च० श० अ० ३ श्ल० १७ )

२. वीर्य, आरोग्यता, बल, वर्ण और मेधा भी सात्य से उत्पन्न होते हैं । (सु० श० अ० ३ श्ल० ४७ )

५ रसके अशसे क्या क्या बनता है ?

१. गर्भ रसज होता है । गर्भ उत्पन्न करना तो दूर रह- किलु आहार रसके चिना माताकी भी जीवन-यात्रा नहीं चल सकती । अच्छी तरह रस सेवन करनेसे गर्भ उत्पन्न हो सकता है । परंतु केवल रस-सेवनसे ही गर्भ उत्पन्न नहीं होता । बात यह है कि गर्भ उत्पन्न होनेमें रस भी एक कारण है । (च० श० अ० ३ श्ल० ५९ )

२. शरीरका मोटापन, बल, वर्ण स्थिति और क्षीणता ये रससे उत्पन्न होते हैं । (सु० श० अ० ३ श्ल० ४७ )

यहांपर एक यह शब्दा होती है कि सुश्रुत महाराज ने वीर्यको पित्तज और सात्यज तथा बल और वर्णको सात्यज