संतति शास्त्र
Santati Shastra
by पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव
Source: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (origin)
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Read in contextगर्भमें शरीर कैसे बनता है ?
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पट्टे दिखलाई पड़ने लगते हैं। बच्चेका कुछ हिलना भी जान पड़ता है। मांस-रक्त वराबर दिखलाई पड़ती हैं। चेहरा अधिक लम्बा हो जाता है। चमड़ेका रंग गुलाबी होता है। फेफड़ा बन जाता है, लम्वाई ६ इञ्च और वजन २० तोलातक होता है।
२. सारे अंग प्रत्यंग जान पड़ते हैं। हृदय भराट हो जाता है। चैतन्य-धातु आ जाती है; क्योंकि हृदय चेतनाका स्थान है। इस कारण जीव इंद्रियोंके भोगकी क्षति करने लगता है। (सु० श० अ० ३ श्लो० १९)
३. इस मासमें स्त्रीकी दौहद संझा होती है। इसी समय वाञ्चित पदार्थ न मिलनेसे सन्तान अंगहीन हो जाती है। (श० क०)
४. इस मासमें गर्भ दृढ़ होता है और माताका शरीर भारी हो जाता है। (च० १० अ० ४ श्लो० २४)
१५. पाँचवाँ महीना।
१. इस मासमें शरीरकी अपेक्षा सर बड़ा होता है। बालक-की फड़कन मालूम होती है। सर पर भूरे बाल उग आते हैं। चमड़ी चिकनी हो जाती है। रंग और पट्टेखूब अच्छे बन जाते हैं। बच्चा बार बार हिलता है। लम्वाई १० इञ्च और वजन ३० तोले तक होता है।
२. पाँचवें मासमें मनमें अधिक चैतन्यता हो जाती है। (सु० श० अ० ३ श्लो० ३३)
३. इस मासमें गर्भका मांस और स्निग्ध पुष्ट होता है। इसलिये स्त्री दुबली हो जाती है। (च० १० अ० ४ श्लो० २५)
४. इस समयमें बुद्धिका विकास होने लगता है।
(वा० श० अ० १ श्लो० ५७)