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संतति शास्त्र

संतति शास्त्र

Santati Shastra

by पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव

Source: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (origin)

Devanagarihipublished302 pages

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बच्चेकी दौदाइशके समयका कर्तव्य ।

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है। जब बालक योनि-द्वारसे नीचे उतरता है तब जो पीड़ा होती है वह सहन करने योग्य नहीं होती। ऐसी पीड़ा उन स्त्रियोंमें कि जिनको पहले पहल बच्चा होता है, कठिन होती है, परन्तु जिनके दो चार बार बच्चा हो चुका है, उनके कुछ कम होती है।

सबसे पहला काम प्रसवमे जरायुका मुख चौड़ा होना है। इसमें प्रायः दस बारह घंटे लगते हैं। परन्तु जब पहले पहल बच्चा होता है तो और भी देर लगती है। गर्भाशयका मुख चौड़ा होनेके बाद बच्चा पैदा होनेमें दो तीन घंटे उन स्त्रियोंको लगते हैं कि जिनके बच्चा कई बार हो चुका है, नयी स्त्रियोंको कुछ और देर लगती है।

जैसे जैसे गर्भाशयका मुख फैलता जाता है तैसे तैसे भिल्लीकी थैली जिसमे कि बच्चा रहता है आगेको निकलती चली आती है। जब गर्भाशयका मुख अच्छी तरह फैल जाता है तब जरायु और योनिका रास्ता एक हो जाता है। ऐसी दशामें तेज पीड़ा होती है। इसका कारण वह है कि बच्चा नीचे उतरता है। इस समय स्त्रियां बहुत बड़ी असामधानियां करती हैं। प्रायः देखा गया है कि स्त्रियां खड़ी होती हैं, उठती बैठती और बार बार चलती फिरती हैं। उकरूँ बैठकर काँख-ती, खांसती और जोर लगाती हैं। कभी दूसरी स्त्रियां पेट मसलती और दबाती, हैं इससे बड़ी हानियां होती है। ऐसे ही कर्म बच्चेको कभी कभी टेंहा कर देते हैं। अंगरेंजोंके यहां पलंगपर लिटा कर बच्चा जमाया जाता है। इस विषयमें वैद्य-कका मत है कि लेटकर बच्चा जानानेसे किसी अवयवमें आघात नहीं पहुंचता (१० क०) और यही धन्वन्तरिमहाजका भी मत है। बच्चा पैदा होनेमें स्त्रीको दर्द क्यों होता है ? इसका