संतति शास्त्र
Santati Shastra
by पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव
Source: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (origin)
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सन्तति-शास्त्र ।
हो तो वच्चके गलेमेंसे नालको निकाल देना चाहिये । पैदा होते समयमें सरको दहिने हाथसे सँभालना और वार्प हाथसे गर्भाशयको पेटके ऊपरसे दवाते रहना चाहिये । ऐसा करनेसे बच्चा पैदा होनेमें सहारा लगाता है और गर्भाशय सिकुड़ता जाता है । इस प्रकार करनेसे बच्चा सुख पूर्वक स्वयं निकलता चला आचेगा । जब पैदा होनेमें देर लगे तो समझना चाहिये कि बच्चेका सर बड़ा है या कोई विकार उत्पन्न हो गया है ।
वैद्यकका मत है कि जब बच्चा पैदा होनेमें देर लगे या न पैदा होता हो, तो ऐसे समयमें काले सर्पकी कँचुलकी धूनी देनी चाहिये । ( श० क० )
एक आचार्यका मत है कि गऊका मस्तक जिसमें मांस और चमड़ा न हो केवल हड्डी ही हड्डी हों उसको बच्चा पैदा होनेवाले मकानकी छतके ऊपर रखनेसे सुखपूर्वक बच्चा उत्पन्न होता है । ( रतिनाम्न )
नहीं रोशनीके लोग ऐसे प्रयोगोंको व्यर्थ समझते हैं, परन्तु जहाँ यह प्रयोग किया गया है सफलता हुई है । प्रायः नास-भम दार्यों बच्चेको खींचकर निकालनेकी कोशिश करती हैं । ऐसा करना भयङ्कर है । इससे हाथ पैर उखड़ जानेका भय रहता है ।
जब बच्चा पैदा हो जावे तो उस समय बहुत बड़ी सावधानीसे काम लेना चाहिये । सबसे पहले बच्चेके मुँह, आँख कान, नाक और नखोंको साफ़ कपड़ेसे नुब स्वच्छ करना और मुखमें अँगुली डालकर भाग कि जो भीतर तक भरा रहता है साफ़ करके नाल काटना चाहिये । नाल वह चीज़ है कि जिससे गर्भमें बच्चेका पोषण होता है । यह बच्चेको नाभी में लगा रहता है और पैदा होने पर बच्चेके साथ बाहर निकल