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संतति शास्त्र

संतति शास्त्र

Santati Shastra

by पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव

Source: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (origin)

Devanagarihipublished302 pages

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सन्तति-शास्त्र ।

चौगुना एक फिल्लीमें दँका हुआ होता है। चलनेकी शक्ती इसी तार और फिल्लीमें ही होती है। वीर्यमें थोड़ीसी पतली और बहनेवाली वस्तुके सिवा विशेष भाग कोईका ही होती।

इसी भाँति रजमें भी एक प्रकारके जन्तु पाप जाते हैं। जिनको शर्तव जन्तु, रज-जन्तु या रज-कोप (Sell-) कहने हैं। डाकूर कालिलकरके मतानुसार एक रज-कोपका आकार \frac{1}{300} इञ्च होता है। इसकी दन्तावट एक ग्रण्डकी भाँति होती है। ऐसे रज-कोपका व्यास \frac{1}{320} से \frac{1}{200} इञ्च तक होता है।

रज और वीर्यके मिश्रणमें बालकका शरीर बननेके लिये सारे अवयव रहते हैं। कुछ अंगोंकी उत्पत्ति मानाके रज और कुछेककी पिताके वीर्यमें होती है। इसलिये रज और वीर्यके मेलसे जो आकार घनता है वह सारे अवयवोंसे पूर्ण होता है।

(३) शुद्ध और दूषित रज-वीर्यकी पहचान ।

रज और वीर्यका वर्णन पहले कर चुके हैं, साथ ही साथ यह भी जानना आवश्यक है कि शुद्ध और दूषित रज-वीर्यके लक्षण क्या हैं।

शुद्ध रज ।

१—खरहा (खरपाश) के खधिरको समान लाल या लालके रंगके सदृश जिसमें सफेद वस्त्र रंग कर सुखानेसे फिली प्रकारका दाग न पड़े और धो डालनेसे सफेद हो जाय, वही शुद्ध रज है। (सु० न० ७० २ श्लोक १००)

२—लाखके रंगकासा लाल, जिसके निकलनेमें जलन और पीडा न हो कपड़ेमें दाग न पड़े और दुर्गन्ध न आती हो।

(१० क०)