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संतति शास्त्र

संतति शास्त्र

Santati Shastra

by पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव

Source: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (origin)

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सन्ताति-शास्त्र ।

लिये यदि मूत्र न हो तो सबसे पहले मैल देरपना चाहिये । यदि मैल न लगा हो और पेशाब न हो, तो पेशाबके स्थानको गरम पानीसे धोना चाहिये, इसलिये, कि थोड़ी गरमी पहुँचे । यदि चौबीस घंटेतक पेशाब न हो, तो रोग समझना चाहिये । पेशाब होते ही यह देखना चाहिये कि वह कैसा होता है । पहला पेशाब कुछ रंगतदार होगा, दूध पीनेपर कुछ सफेदी आ जावेगी । इसके साथ ही साथ इसपर भी ध्यान देना जरूरी है कि पेशाब करते समयमें अच्छा काँयता तो नहीं और कष्टके साथ तो पेशाब नहीं होता । यदि ऐसा है तो अवश्य रोग है और वह रोग अच्छेको उसके माता-पितासे मिला है ।

पेशाबकी भाँति पाखानेको भी देखना आवश्यक है । पैदा होनेके दिन ही अच्छेको पाखाना होना चाहिये । पहले और दूसरे दिन पाखना काले रंगका होता है । दूध पीने पर रंगत बदल जाती है । यदि पाखना न हो तो धीरे धीरे पेट मसलना उत्तम है । यदि पाखानेमें फुटकी सी हों, तो अवश्य दूधका विकार है कि जो ठीक ठीक नहीं पचता । प्रायः चबोको पैदा होते ही कच्चा भी होता है और यह रोग माता-पितासे मिलता है ऐसी दशामें गायका दूध देना हितकारी है । चबोको समयपर पाखाना जानेकी वान डालनी चाहिये । माताओंको यह विचार रहता है कि जितनी बार चबो पाखाना जायगा उतना ही पेट साफ रहेगा । इस कारण वह बारबार पाखाना बैठाया करती हैं, यह ठीक नहीं । दिन रातमें तीन बार प्रातःकाल, दोपहर और शामको पाखाना जानेकी वान डालनी चाहिये । यदि इन समयोंपर अच्छा पाखाने न भी जाय तो चैदा देना चाहिये । ऐसा करनेसे वान पड़ जायगी । जब अच्छा