संतति शास्त्र
Santati Shastra
by पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव
Source: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (origin)
Page 296 of 302
Read in contextस्तनोंके रोग ।
२७५
जब ऐसे दाने पड़कर फूटते हैं तो जहाँ वह पानी लगता है वहाँ वैसे ही दाने पड़ जाते हैं ।
७ स्तनोंका वदना । इसके कई कारण हैं ।
१. गर्भाशयके विकारसे ।
२. ऐसे भोजनसे कि जिससे चरबी अधिक बनती है ।
ऐसी दशामें अनेक लक्षण होते हैं ।
१ स्तनोंमें दूधका अधिक आना ।
२. थोड़ी थड़ीसी सरसराहट मालूम होती है ।
३. स्तनों का मोटा हो जाना ।
जब ऐसा होता है तो स्तन बढ़ते चले जाते हैं, परन्तु यह रोग उसी समय होता है जब कि बच्चा पीता हो या गर्भ हो । ये इतने बढ़ जाते हैं कि स्वयं स्त्रिको दुःख होने लगता है । चलवान् स्त्रियोंमें अधिक पाया जाता है । प्रायः देखा गया है कि स्तन इतने बढ़ जाते हैं कि पीठके पीछे बैठकर बगलसे लेजाकर बच्चे पीते है यह रोग रडियोंमें प्रायः होता है ।
८. स्तनकी कठोरता—इसके कई कारण हैं ।
१ जो माताएँ अपने वदन और स्तनोंको सुन्दर सुडौल बनाये रहनेके कारण दूध रहते हुए बच्चोंको नहीं पिलातीं उनकी छातियोंमें दूध सूखकर स्तन कठोर हो जाते हैं ।
२. दूध न होता और स्तनका छोटा होना ।
ऐसी दशामें कई लक्षण होने हैं ।
१. स्तन कड़ा पड़ जाता है और दूध नहीं आता ।
२. टटोलनेसे स्तनमें गिलदियाँ आपसमें जकड़ी सी मालूम होती हैं और भिटनी छोटी पड़ जाती है ।
जब ऐसी दशा होती है तब दूध नहीं आता । स्तन कड़े बने रहते हैं और कुछ छोटे हो जाते हैं ।