संतति शास्त्र
Santati Shastra
by पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव
Source: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (origin)
Page 39 of 302
Read in context१८
नन्दादिशास्त्र ।
६. नन्दादिशान्तर-
१. यह योग अज्ञान स्थित्ये विभेद होता है। इसके अनेक कारण हैं—
१. कल अवस्थाने ही संयुक्तों अधिक्ता।
२. रक्षका कल होता।
३. सार कार गर्भका गिरता।
४. अर्द्धांनं गहरी बौद्धका पहुँचता।
५. पत्नी औपधियोंका काला कि जिससे संशोधन बन्द होता है।
६. विषम स्वरके होनेसे।
७. उपवास, नन्दादि और संग्रहणसे।
८. शरीरसे रक्तका कमी रक्त कल करने से।
९. नन्दिश अधिक पीनेसे।
इनमें अनेक तत्त्व होने हैं।
१. प्रारम्भसे रजका रक्त रक्त और आना और गंगवृद्धिसे पर बन्द हो जाता।
२. नुक्ते अन्तर्त दुर्गदका आना।
३. पुरुष संयोगको चित्त न चाहता।
४. अर्द्धांनं काले।
१. यह मातृसौ योग नहीं है। अर्द्धांनं अन्तर प्रवर्त पदार्थ नर जाता है, जिससे अर्द्धांनं बढ़ जाता है और पद अन्तरांनं समाप्त हो जाता है। अर्द्धांनं और उसके अन्तरांनं गाँठ पड़ जाती है अथवा एकके नीचे दूसरे गाँठ पैदा हो जाती है। एक गाँठ होने पर उसके नीचे गहरी कोई चीज नहीं होती है,