संतति शास्त्र
Santati Shastra
by पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव
Source: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (origin)
Page 42 of 302
Read in contextफलवाहिनी नलीके रोग।
२१
नली और गर्भाशय ये चार अवयव प्रधान हैं। इनमें फलवाहिनी नलीका काम यह है कि वह गर्भ-अण्डसे गर्भाशयमें ठीक रीतिसे रजको पहुँचावे। इन तीनोंका आपसमें बहुत बड़ा संबंध है। जब गर्भाशय और गर्भ-अण्डमें विकार उत्पन्न होता है तो फलवाहिनी नलीमें अवश्य होता है। जब इसमें विकार उत्पन्न होता है तब गर्भ-अण्ड और गर्भाशयमें हो जाता है। इस प्रकार एक दूसरेके संबंधसे इसमें अनेक रोग उत्पन्न होजाते हैं।
१. फलवाहिनीनलीका शोथ। इसके अनेक कारण हैं—
१. गर्भ-अण्ड और गर्भाशय के शोथ से।
२. रजविकार या चोट से।
३. गुरदे के अनेक रोगों और सरदी पहुँचने से।
४. मदरके अनेक उपद्रव और प्रतिमैथुन से।
इस रोग में अनेक लक्षण प्रकट होते हैं—
१. रजका ठीक समय पर न आना।
२. पेट में पीड़ा और नली में भारीपन।
३. पेट्को ऊपर से दवाने में दर्द।
४. कञ्जियत और भोजन में अरुचि।
इस रोगमें बड़ी सावधानी रखनी चाहिये क्योंकि सूजन के कारण नलीका सुराख बहुत छोटा रह जाता है।
२ फलवाहिनी नलीका टेढ़ा या संकुचित हो जाना।
इसके कई कारण हैं—
१. रक्त-विकार और पेट के परदों में शोथ उत्पन्न होनेसे।
२. गर्भाशय में किसी तरह की चोट पहुँचने से।
३. फलवाहिनी नलीमें किसी प्रकार रक्त जम जाने से।
४. नली में एक प्रकार के मस्से उत्पन्न हो जाने से।