संतति शास्त्र

संतति शास्त्र
Santati Shastra
by पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव
Source: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (origin)
Devanagarihipublished302 pages
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सन्तति-शास्त्र ।
३. निर्वृत्तता, गरीरका पीला पड़ जाना, उठने बैठनेमें कष्ट, संसका उखड़ आना और थोड़े परिश्रमसे थक जाना।
५. मैथुनमें कष्ट और पीड़ा, कै और पाचनशक्तिका कम होना।
६. हाथ पैरके जोड़ोंमें दर्द और पाचनशक्तिमें कमी होना।
७. पेट्ट, पीठ, मायल्लों, सर और पसलियोंमें दर्द।
सबसे पहले गर्भाशयके मुखपर जरा सी सूजन होती है, फिर यही सूजन धीरे धीरे फैल जाती है। इसीसे दाग गोंय हो जाता है। ऐसी दशामें खास कारण प्रदर समझना चाहिये। जब तक यह अच्छा न होगा इसका नर्वंधी कोई रोग अच्छा नहीं हो सकता। ऐसी दशामें चिकना बहनेवाला पदार्थ निकला करता है, परन्तु जब किसी तरहकी रुकावट हो जाती है, तो अन्दर ही मरा रह जाता है।
७. गर्भाशयकी जलन।
इसके अनेक कारण हैं।
- १. रजो-दूशनके समयमें सर्दीका लगना, गरम चीज़ोंका खाना और अतिमैथुन।
- २. बच्चा पैदा होने समयमें किसी प्रकारकी गन्दगी गर्भाशयमें पहुँचना।
- ३. बच्चा पैदा होने समयमें चोट लगना और गर्भाशयका ठीक ठीक न सिकुड़ना।
- ४. नाल खोंचनेमें खेड़ीका टुकड़ा अन्दर रह जाना।
- ऐसी दशा में अनेक लक्षण होते हैं।
- १. पेटका भारीपन और दर्द, कमर छाती पेट्टमें कठिन पीड़ा
- २. पहिले रज-स्त्राव होना और पीछे रुक जाना। मैथुनमें कष्ट।