BharatKosha
संतति शास्त्र

संतति शास्त्र

Santati Shastra

by पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव

Source: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (origin)

Devanagarihipublished302 pages

Page 64 of 302

Read in context
Page 64

गर्भाशयके रोग ।

४३

५. पेड़ में घोंफ सरीखा जान पड़ता है और जी मचला ता है ।

६. भोजन नहीं पचता ।

यह रसौली गर्भाशय में होती है और रस से भरी रहती है यह गर्भाशय की परत के भीतरी हिस्से में बढ़ती है और कभी अगले हिस्से में भी सुपारी से लेकर नारियल के आकार तक देखी गई है । यह एक से अधिक भी होती है । प्रारम्भ में कुछ जान नहीं पड़ता—परन्तु विकार उत्पन्न होते ही रजो धर्म में खराबी आ जाती है । ज्यों ज्यों यह बढ़ती है आस पास के गर्भस्थानों पर दबाव पड़ता है । इसमें गर्भ नहीं रहता यदि रोग के प्रारम्भ होते समय में गर्भ रह जाय, तो पात हो जाता है । प्रारम्भ में रजचिकार का मामूली रोग सम्भकर बहुत कम ध्यान दिया जाता है ।

१६. गर्भाशयका नासूर ।

१. पुराने जखम से नासूर हो जाता है । जब गर्भाशय में फुन्सी बगीरह हो जाय और वह पके या फूटकर अथवा चहा करे, तो उसको नासूर कहते हैं । इस में से पतली मवाद या पानी सा निकला करता है । दर्द रहता है और खाज मालूम होती है ।

१७. गर्भाशयका टेढ़ा हो जाना ।

यह आगे और पीछे से टेढ़ा होता है ।

इसके कई कारण हैं ।

१. जब मूत्राशय खाली है, तो पाखाना जाते समय अधिक जोर पड़ने से ।

२. तीक्ष्ण मरोड़े होने और बन्धनों के ढीले पड़ जानेसे ।