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संतति शास्त्र

संतति शास्त्र

Santati Shastra

by पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव

Source: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (origin)

Devanagarihipublished302 pages

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रजस्वलाके कर्तव्य ।

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द्रोप सन्तानमें आ जाते हैं। इसी लिये एकान्त-वासकी विधि कही गयी है। ऐसे समयमें स्त्रियाँ भोजनका ज़रा भी विचार नहीं करतीं। पुरानी रीतिके अनुसार वासी भोजन करती हैं, परन्तु यह आलस्य पैदा करता है। गरम भोजनसे रजवाहिनी नलियोंमें गरमी पहुँचती है, जिससे अधिक रज निकलनेका भय रहता है। अतएव ताज़ा भोजन ठंडा करके खाना चाहिये! गव्दा, कसैला, वादी, चरपरा और तैलसे बना हुआ भोजन हानि पहुँचाता है। इस लिये वैद्यकका मत है कि मीठा और जल्दी पचनेवाला भोजन करना उत्तम है। ( श० क० )

रजवतीको सिवा एकान्त-वासके और कुछ न करना चाहिये, क्योंकि वैद्यकका मत है कि “अद्यु समयमें दिनमें सोने-से बहुत सोने वाली, काजल लगानेसे श्रंथी, रोनेसे नेत्र विकारवाली, स्नान करने, उवटन और चन्दन लगानेसे दुःखी, नैल लगानेसे कुशी, तारखुन काटनेसे खराब नाखूनोंवाली, दीड़कर चलनेसे चंचल, हँसनेसे काले दांतों और काले ओठ वालू तथा काली जीभ वाली, बहुत बोलनेसे वकवादी, तेज आवाज़ सुननेसे वहिरी, बालोमें कंधी करनेसे गंज रोगवाली, अधिक हवा खाने और कष्ट करनेसे मतवाली सन्तान उत्पन्न होती है।”

( सु० श० अ० २ श्लो० २३-२४ )

एक विद्वानकी राय है कि अश्लील गीत गानेसे बुढ़ी पुस्तकों-के पढ़ने, हँसी दिल्लागी, मज़ाक और बेहूदी बातें बफनेसे निर्लज्ज, परिश्रम करनेसे रोगी, सीनेसे नेत्र विकारवाली, पुरुष संयोग-से अनेक रोगयुक्त यदि कन्या हो तो वेश्या या गुप्त व्यभिचार वाली और यदि पुत्र हो तो वेश्याओंसे अदल प्रेम रखनेवाला वदचलन, शूद्धार करनेसे कामी, व्यभिचारी और शौकीन, भूठ बोलनेसे पारखंडी, क्रोध करनेसे दुष्ट, मांस खानेसे पापी, शराब