संतति शास्त्र
Santati Shastra
by पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव
Source: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (origin)
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Read in contextरजस्त्राताके कर्तव्य ।
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जाती हैं। अतएव एक विद्वानकी राय है कि रजवतीको एकांत-वास करते हुए आरामके साथ तीन दिन हलका भोजन करके रहना चाहिये। ( रतिनात्त )
( १३ ) रजस्त्राताके कर्तव्य ।
स्नान करके स्त्री जब शुद्ध होती है, तो उस समयमें ईश्वरने स्त्रियोंकी आँखोंमें एक ऐसी शक्ति दी है कि वह जैसे स्त्री वा पुरुषका दर्शन करती है उसके हृदयपर उसका ऐसा प्रभाव पड़ता है कि जिससे उसीके अनुसार सन्तान उत्पन्न होती है। वैद्यकका मत है कि स्नान करके नये कपड़े पहन, संगल पाठ और स्वस्तित्वान्न (यह वैदिक कर्म है)पूर्वक पतिका दर्शन करना चाहिये। इस लिये कि उसीके समान सन्तान हो। ( सु० श० अ० २ श्लो० ई० ) परन्तु यहाँ पर यह शंका होती है कि यदि पति कुरूप और अँगहीन हो, तो उसके दर्शनसे उत्तम सन्तान कैसे हो सकती है ?
इस विषयमें दूसरे आचार्यका यह मत है कि पति अथवा प्रियजन, देवर वा पुत्र इत्यादिके दर्शन करने चाहियें।
( भा० १० श्लो० ११ )
कोई आचार्य पतिके कुरूप होनेपर, देवर, पुत्र या ब्राह्मण का बालक, इनमें जो रूपवान हो उनके अथवा देवताकी सुन्दर प्रतिमाके दर्शन करनेका विधान करते हैं। ( श० ६० )
प्रायः लोग इस बातपर विश्वास नहीं करते परन्तु जहाँ तक यह बात देखी गई है, सत्य है।
( १ ) मेरे एक मित्रके साले अपनी बहनसे मिलने आये। वह रजवती थी और चौथा दिन था। स्नान करकेस्त्री अपने भाईसे उत्पन्न ही मिली। दैव-संयोग उसी स्नानसे