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संतति शास्त्र

संतति शास्त्र

Santati Shastra

by पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव

Source: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (origin)

Devanagarihipublished302 pages

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सन्तति-शास्त्र ।

(१६) मेद-वृद्धि अर्थात् शरीरमें

चरबीका बढ़ना ।

शरीरमें चर्बीके बढ़नेको मेद वृद्धि कहते हैं। यह रोग स्त्रियोंको विशेष रीतिसे होता है, खासकर उनको जो वैठी रहती हैं। और कुछ काम नहीं करतीं या जिन्हें उत्तमोत्तम भोजन मिलता है। वैद्यकका मत है कि दिनोंमें सोनेसे, कफ उत्पन्न करनेवाले चिकने मोटे पदार्थों के सेवन करनेसे, भोजनका रस मधुर होकर मेदको बढ़ाता है। बढ़ती हुई चर्बीका असर शरीरमें हर जगह होता है। इस कारण रसवाही शिराओंका रास्ता बंद हो जाता है। ऐसी दशामें हड्डी, मज्जा और चीन्य पुष्ट न होकर फेंचल चर्बी ही बढ़ती है। अतएव मनुष्य सुकुमार और आलसी होकर सच कामोंमें पीछपहीन हो जाता है।

( श० क० )

स्वर्वास रोग, व्यास, निद्रा, आलस्य, भूख, पसीना और दुर्गंध ये बातें चर्बी बढे हुए मनुष्यमें अवश्य होती हैं। प्रायः देखा गया है कि ऐसे रोगी खाते बहुत हैं। शरीरके सच स्थानों में तो चर्बी बढ़ती ही है, परन्तु पेट, नितम्ब, छाती और पिंड-लियोंमें अधिक, किन्तु ताकत कम हो जाती है। स्त्रियोंमें गर्भाशयका मुँह मोटा पड जाता है और चर्बीसे मिश्रित कोई पदार्थ उस जगह रहता है। चर्बीके कारण योनि संकुचित अर्थात् सक्की पड जाती है ऐसी स्त्रियोंमें स्नान ठीक ठीक नहीं बनता। यही कारण है कि सबसे पहले रजका चिगाड होता है। जब स्त्रुय अच्छी तरह चर्बी बढ़नेमें छा जाती है, तो