सात्वत संहिता (पाञ्चरात्र आगम - भगवान् सङ्कर्षण-नारद संवाद सान्वय सटीक)
Satvata Samhita of Pancharatra Agama with Commentary
by भगवान् सङ्कर्षण / महर्षि नारद
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Read in context३५८ सात्वतसंहिता फिर भगवान् नृसिंह के शरीर से उत्पन्न हृदयादि चतुष्टय में कमलपत्र के पूर्व दिशा से लेकर उत्तर दिशा पर्यन्त भगवान् हरि का न्यास करे । कमल के आग्नेय, ईशान, नैर्ऋत्य तथा वायव्य कोण में अस्त्र मन्त्र से क्रम पूर्वक न्यास करना चाहिए ॥ ६५-६६ ॥ केशर जाल पर नेत्र का, तीनों नाभियों पर चक्र का और श्रीवत्स, कौस्तुभ तथा वनमाला का चक्र के उत्तर और पश्चिम के तीनों अराओं पर न्यास करे । कमल अत्यन्त तीक्ष्ण नन्दक नामक खड्ग का न्यास करे ॥ ६७-६८ ॥ देवता के दक्षिण, पूर्वभाग और दक्षिण भाग में कार्मुक धनुष, चक्र और शङ्ख इन तीन का न्यास करे ॥ ६९ ॥ देवता के नेमि स्थान पर श्रीदेवी का और उत्तर भाग में पुष्टि देवी का न्यास करे । इसी प्रकार देवता के पृष्ठभाग में स्थित निद्रा का तथा अग्रभाग में सरस्वती का न्यास करे ॥ ७० ॥ वामदक्षिणभागाभ्यां वीथिस्थमिषुधिद्वयम् । द्वारेष्वस्त्रं न्यसेद् भूयो मुद्रां कोणचतुष्टये ॥ ७१ ॥ सायुधानथ दिक्पालान् स्वस्थाने मण्डलाद् बहिः । मण्डलवीथ्यादिष्वर्चनीयान् परीवारानाह—वामदक्षिणेति सार्धेन । इषुधिद्वयं तूणीरद्वयमित्यर्थः । द्वारेष्वस्त्रं = चक्रमित्यर्थः । पूर्व भोगयागे चक्रगदयोरुक्तत्वाद् भूय इत्युक्तम् ॥ ७१-७२ ॥ वाम एवं दक्षिण भाग में वीथी में रहने वाले दो तरकसों का न्यास करना चाहिए । इसी प्रकार द्वार पर अस्त्र (=चक्र) का न्यास करे तथा चारों कोणों पर पुनः मुद्रा न्यास करे । फिर मण्डल के बाहर दशों दिशाओं में पूर्वादि क्रम से आयुध सहित दिक्पालों का न्यास करे ॥ ७१-७२ ॥ मूलमन्त्रादीनां ध्यानकथनम् एवं न्यस्य ततो ध्यायेन्मन्त्रव्यूहं यथास्थितम् ॥ ७२ ॥ सर्वदेवमयं देवं सर्वेषां तेजसां निधिम् । सर्वलक्षणसम्पूर्णं सार्वज्ञादिगुणैर्युतम् ॥ ७३ ॥ निष्प्रप्तकनकाभं च सम्पूर्णाङ्गं महातनुम् । घोरशार्दूलवदनं चण्डमार्तण्डलोचनम् ॥ ७४ ॥ सौदामिनीचयप्रख्यैर्लोमभिः परिपूरितम् । अरुणाम्भोजपत्राभं वज्राधिककरोरुहम् ॥ ७५ ॥ चलत्फणीश्वरसटं चन्द्रकोटिशतद्युतिम् ।