शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
by लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम
Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (origin)
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Read in contextएकोनविंश पटल ] [ ४६१ मध्ये भान्तं भृगुविनिहितं नामवर्णैः प्रवीतम् । टान्तं लान्तोन्वितमथलिखेदष्टपत्रेषु भूयः । भूविम्बस्थं निगदितमिदं साधुसञ्जीवनाख्यम् । शस्त्रोद्भूतं भयमपहरेत् धार्यमाण भुजेन ।५८ वार्णावृतं साध्ययुत सकार टान्ते लिखेदिष्टदलेषु हंसम् । आवेष्टयेदम्बुगृहेण बाह्यं लान्तावृत्तं यन्त्रमिदं ज्वरघ्नम् ।५६ अब पिण्ड बीज का उद्धार कहते हैं-मनुस्वर का अर्थ है 'औ' - इन्दु अर्थात् विन्दु, अजेश, जकार, अग्नि, रेफ यह चतुरानन वकार है । यह पिण्ड बीज मनुष्यों के समस्त अर्थों का साधक कहा गया है । ।५२। इस बीज के द्वारा जाप किया हुआ मन्त्र परम रक्षा करने वाला होता है यह आयु और आरोग्य को उत्पन्न करने वाला तथा लक्ष्मी और सौभाग्य एवं वश्य करने वाला होता है ।५६। चोर, सर्प, मृग, व्याल और भूत योनि द्वारा होने वाले भय को दूर करता है। स्त्रियों के गर्भ की रक्षा करने वाला और पुत्र सन्तति प्रदान किया करता है तथा क्षुद्रों का नाशक है । इसको मस्तक पर धारण करने पर अत्युत्तम लोगों को वश्य किया करता है ।५४। अब अन्य मन्त्र के विषय में बतलाते हैं - कर्णिका के मध्य में लकारन्त यकार के सहित साध्य और साधक का नाम लिखना चाहिए । आठों दलों में हंसार्ण से संवेष्टित सब ओर हंस मन्त्र लिखे । इस मन्त्र को भूमिगृह से वेष्टित कर सदा मस्तक पर धारण करना चाहिये । इसका फल यह होता है कि क्षुद्र-महा ज्वर की पीड़ा का तथा शत्रुओं का हनन कर देता है और यश तथा सम्पत्ति प्रदायक होता है । अब वश्य करने वाला बताया जाता है-ईकार के मध्य में साध्य को लिखकर उसको फिर अष्ट दलों में लिखना चाहिये । उससे धरा पुरस्थ को संवेष्ठित करेतो यह मन्त्र मनुष्यों को वश्य करने वाला होता है। ताम्र पात्र में इस मन्त्र को लिखकर फिर इसकी अर्चना करनी चाहिए तो यह सभी मनुष्यों को वशीभूत कर लिया करता है- इसमें तनिक भी सन्देह नहीं करना चाहिये ।५७। अब अन्य के भय को