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शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

by लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम

Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished511 pages

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४८४ ] [ श्रीशारदा तिलक सत्यं हेतुविवर्जितं श्रुतिगिरामाद्यं जगत्कारणम् । व्याप्तस्थावरजङ्गमं निरुपमं चैतन्यमन्तर्गतम् । आत्मानं रविवह्निचन्द्रवपुषं तारात्मकं सन्ततम् । नित्यानन्दगुणालयं सुकृतिनः पश्यन्ति रुद्धेन्द्रिया ।५६ मदमस्त भ्रमर की अङ्गना के समान प्रथम ध्वनि होती है । बाँस के छिद्र के पूर्ण होने पर जैसी ध्वनि हुआ करती है उसीके सदृश दूसरी ध्वनि होती है ।४८। फिर घण्टा की ध्वनि के तुल्य ध्वनि होती है, पीछे मेघ के गर्जन के सदृश ध्वनि होती है । इसी प्रकार ने अभ्य'स करने वाले पुरुष को संसार के ध्वान्त (अन्धकार ) का विनाश हो जाया करता है ।४६। हंस के लक्षण वाला अन्यय पहिले ज्ञान उत्पन्न होता है । मनीषियों ने विन्दु और सर्ग को पुम्प्रकृति के स्वरूप वाला बताया है । उन द्वीपों से क्रम से अवसानक विन्दु और सर्ग समुत्पन्न होते हैं । वे दोनों पुम्प्रकृति द्विनाम वाले हंस है । हे पुमान् है सौ प्रकृति है ।५०-५१। ये दोनों अजपा कहो गयी है । फिर यह बीज उपस्थित हुआ करता है । पुरुष को स्वाश्रय मानकर प्रकृति नित्य ही उसी के समाश्रित है यही इन दोनों का सम्बन्ध है ।५२। जिस समय में उस भाव को प्राप्त करता है तब मैं वहीं हूँ ऐसा भास हुआ करता है । प्रकृति और पुरुष के अभेद होने से मैं परमात्मा ही हूँ-इस रीति से यह जीव और ब्रह्म का ऐक्य होता है । अजपा के अभ्यास से इस प्रकार का ऐक्य उद्भूत हुआ करता है । सकारार्ण और प्रशारार्ण को योजित करके इसके पश्चात् सन्धि तथा पूर्वरूप करे तो यह प्रणव हो जाया करता है, यह परानन्दमय और एक जप के गुण से युक्त होता है आत्मा के अभेद में स्थित रहने वाला योगी सदा इस प्रणव की भावना किया करता है ।५४। जो आत्मनिष्ठ पुरुष होते हैं वे सदा प्रणव की भावना किया करते हैं । उस तारात्मक को देखते हैं जो आम्नाय के वचनों से अत्यन्त दूर है, आद्य, वेद्य तथा स्वसंवेद्य गुण से युक्त है और आनन्द रस के सागर आत्मा का दर्शन करते हैं ।५५। अपनी