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शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)

Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary

by लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम

Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished511 pages

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४८८ ] [ श्रीशारदा तिलक कुण्डलिनी पिण्ड होती है, सकल का अन्तरात्मा हंस शिवात्मा है। अनन्तकान्ति अतीतरूप शिव सामरस्य होता है । ६३ । सन्तगण शिवसामरस्य से पिण्डादि योग को सबीज योग कहा करते हैं । नित्या- गुणाभियुक्त शिव में फल निर्व्युपेक्ष निर्बीज योग होता है ।६४। इसके अनन्तर फिर कुण्डलिनी को चिन्तन करना चाहिये जो मूलोन्निद भुजङ्ग को राजमहिषी है और सुषुम्ना के अन्दर वमन करती हुई है । शीघ्र ही आधार समूह का भेदन करके विलसत्सौदामिनी सदृश होती है । व्योम कमल में स्थित चन्द्रमा के मण्डल से गलित हुये दिव्य अमृत के समूह से परिप्लुत है । ऐसी इसको स्वगृह में गयी हुई सम्भावित करके पुनः इस कुण्डलिनी का सचिन्तन करना चाहिये । ३५ । नित्य-अनन्त अव्यय गुण वाले हम स्वाधार से निकली हुई शक्ति समस्तों की जननी को हाथ में ग्रहण करके उसको प्राप्त हुई परममुख से पूर्ण शम्भु के निकेतन पहुँची है । उसके द्वारा अनुभव करके करोड़ों सूर्यों के समान रुचिर अपने आश्रय को गमन करती है ऐसी उसका जो जगत् का मोहन करने वाली है ध्यान करना चाहिये । ६६। अव्यक्त अजित रुचि युक्त पर बिन्दु शिव के आलय को लेकर वह रूपा कुण्डलिनी तीनों गुणों के वसुधारिणी विद्युल्लता के समान है । आनन्द रूपी अमृत के मध्य में स्थित-पुर का भेदन करने वाले-करोड़ों चन्द्र ओर सूर्य की प्रभा से संयुत सबीक्षण करके अपने पुर में गयी है, गणों के द्वारा अनवद्या भगवती का ध्यान करना चाहिये । ६७। मध्य में जो वर्त्म है वह दो वायुओं के परस्पर संग्रह से होने वाले क्षोभ से समुत्पन्न हैं, ऐसे शब्द स्तोम को अतीत करके करोड़ों तड़ित् के समान भासुर तेज में उदित होती हुई नूतन जया-सिन्दूर और सन्ध्या के समान अरुण सान्द्र आनन्द रूपी अमृत से परिपूर्ण प्राप्त परशिव परा देवता की समुपासना करते हैं । ३८। गमन और आगमन में जड़ि घकी वह कुण्डली योग के फलों का विस्तार किया करती है । यह आकुलोंके लिये मुदित कामधेनु है और इच्छित संकल्पों के लिये लता है, इसका सेवन करो ।६६।