शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
by लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम
Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (origin)
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Read in contextएकविंश पटल ] - [ ४६७ कान्तिं दुर्गा सरस्वत्यौ विश्वरूपां ततःपरम् । विशालासंज्ञितामीशां व्यापिनीं विमलां यजेत् ॥२५ ततोऽपहारिणी सूक्ष्मां विश्वयोनि जयावहाम् । पद्मालयां परां शोभां पद्म ॱपां ततोऽर्चयेत् ॥२६ ब्राह्मयाद्याः सारुणा वाह्ये पूजयेत्प्रोक्तलक्षणाः । ततोऽर्चयेद्ग्रहान्बाह्ये शक्रादीनायुधैः सह ।२७ इत्थमावरणैर्देवीं दशभिः परिपूजयेत् । धर्मार्थकाममोक्षाणां भोक्ता स्याद्द्विजसत्तमः ।२८ मूल मन्त्र के द्वारा क्लृप्त अर्थात् कल्पना की हुई मूत्ति में देवी का प्रकृष्ट पूजन करना चाहिये । तीनों कोणों में ब्रह्मा आदि शक्तियों का अभ्यर्चन करे । २२। उसके बाहर फिर आदित्य आदि का जो उषा आदि के सहित ही होवें क्रम से पूजन करे । इसके उपरान्त केसरों में षट् अङ्गों का विधि के अनुसार ही अभ्यर्चन करना चाहिये ।२३। इसके पश्चात् प्रह्लादिनी, प्रभा का तथा नित्या और फिर विश्वम्भरा का यजन करे । फिर विलासिनी, प्रभावती जया और शान्ति का अर्चन करना चाहिये ।२४। फिर कान्ति, दुर्गा, सरस्वतो और इनके पीछे विश्वरूपा का अर्चन करे । फिर विशाल संज्ञा वाली, ईशा, व्यापिनी और विमला का यजन करना चाहिये ।२५। इसके अनन्तर अपहारिणी, सूक्ष्मा, विश्वयोनि, जयावहा, पद्मालया, परा, शोभा का और फिर पद्म रूपा का यजन करे ।२६। ब्राह्मी आदि सारुणा का जिनके लक्षण बता दिये गये हैं बाहर में पूजन करना चाहिये । इसके अनन्तर बाहर में शक्र आदि ग्रहों का आयुधों के साथ अभ्यर्चन करे ।२७। इस रीति से दश आवरणों के सहित ही देवी का यजन करना चाहिये । ऐसे पूजन करने वाला श्रेष्ठ द्विज चारों पदार्थों का अर्थात् धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का भोग करने वाला.हुआ करता है ।२८।