शारदा तिलक तन्त्र (हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharada Tilak Tantra with Hindi Commentary
by लक्ष्मण देशिकेन्द्र / चमन लाल गौतम
Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली · 1950 (origin)
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Read in context५०० ] [ श्रीशारदा तिलक विद्युद्दामसमप्रभां मृगपतिस्कन्धस्थितां भीषणां । कन्याभिः करवाळखेटविलसद्धस्ताभिरासेविताम् । हस्तैश्चक्रगदासिखेट विशिखांश्चापं गुणं तर्जनीं । बिभ्राणामनलात्मिकां शशिधरां दुर्गा त्रिनेत्रां स्मरेत् ॥४१ मन्त्रवर्णसहस्राणि जपेन्मन्त्रं विशालधीः । तदन्ते तिलसिद्धार्थचित्रमूलैः समिद्वरैः ।४२ अङ्गुष्ठ, गुल्फ, जङ्घा में तथा दोनों जानु और ऊरुओंमें, कटि, अङ्गु, नाभि, हृदय, दोनों, स्तन और दोनों पार्श्वों में, पृष्ठभाग में तथा स्कन्धों के मध्य में, बाहुओं के मूल में और उपबाहुओं में, प्रकूर्पर, प्रकोष्ठ और मणिबन्धों के तलों में, मुख, नासिका, नेत्र और कानों में, मस्तक, मस्तिष्क और मूर्धा में मन्त्रधारी को मन्त्र में होने वाले वर्णों का क्रम से विन्यास करना चाहिये । शिखा, ललाट, नयन, कर्ण, ओष्ठ और रसना में, कण्ठ, बाहु, हृदय, कुक्षि, कटि गुह्य, अरु, जानु, में, दोनों जङ्घाओं में और दोनों पादों मे सुधी पुरुष को चाहिये कि मन्त्र के पदों का न्यास करे ।३६-४०। अब ध्यान बताया जाता है—विद्यु- ल्लता के समान प्रभा वाली, मृगपति (सिंह) स्कन्ध पर विराजमान, परमभीषण, कन्याओं के द्वारा सेवित जिनके करों में करवाल ओर खेट शोभित हैं, जो अपने करों में चक्र गदा, असि (तलवार), खेट, विशिख, चाप, गुण और तर्जनी को धारण करने वाली है, जिनका अनल के समान स्वरूप है और चन्द्रमाके धारण करने वाली है, जिनका नेत्रों से समन्वित हैं, ऐसी दुर्गादेवी का स्मरण करता हूँ ।४१। मन्त्र में जितने वर्ण है उतने ही सहस्र मन्त्र का जप विशाल बुद्धि वाले को करना चाहिये । इस जपके समाप्त हो जानेपर तिल, सिद्धार्थ, चित्रमुल एवं श्रेष्ठ समिधाओं से हवन करना चाहिये ।४२।