शार्ङ्गधर संहिता (दीपिका टीका व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sharangadhara Samhita with Dipika Hindi Commentary
by शार्ङ्गधराचार्य
Source: चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन · चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन (origin)
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Read in contextनवमोऽध्यायः ] घृततैलकल्पना 157 काशीसादि तैल कासीसं लाङ्गली कुष्ठं शुण्ठी कृष्णा च सैन्धवम्। मनःशिलाश्ममारश्च विडङ्गं चित्रको द्रुमः ।। 142 ।। दन्ती कोशातकीबीजं हेमाह्वा हरितालकम्। कल्कैः कर्षमितैरेतैस्तैलप्रस्थं विपाचयेत् ।। 143 ।। स्नुह्यर्कपयसी दद्यात् पृथग् द्विपलसम्मित । चतुर्गुणं गवां मूत्रं दत्त्वा सम्यक् प्रसाधयेत् ।। 144 ।। कथितं खरनादेन तैलमर्शोविनाशनम्। क्षारवत्पातयत्येतददर्शोस्यभ्यङ्गतो भृशम् ।। 145 ।। वलीर्न दूषयत्येतत् क्षारकर्मकरं स्मृतम्। हीराकसीस, कलिहारी, कूठ, सोंठ, पीपल, सेंधा नमक, मैनसिल, कनेर की जड़ अथवा पत्ते, वायविडंग, चीता की जड़, कुरैया की छाल, दन्ती, कडुई तोरई के बीज, सत्यानाशी की जड़, हरिताल प्रत्येक द्रव्य एक कर्ष लेकर कल्क बना लें। तिलतैल एक प्रस्थ (64 तोला), सेहुण्ड (थूहर) तथा आक का दूध दो-दो पल (8-8 तोला) और तैल की अपेक्षा चौगुना (4 प्रस्थ या 3 सेर 16 तोला) गोमूत्र-इन सबको एक साथ मिलाकर भली-भाँति पाक करना चाहिये। यह तैल महर्षि खरनाद का कहा हुआ है और अर्श (बवासीर के मस्सों) को नष्ट करता है। बार-बार अभ्यंग (मालिश) करने से बवासीर के मस्सों को क्षार के समान गिरा देता है और वलियों (गुदवलियों, जिनमें मस्से या मासांकुर होते हैं) को दूषित या खराब भी नहीं करता है, तथापि क्षार का कार्य तो करता ही है। वक्तव्य-अर्श की चिकित्सा के चार उपाय हैं-1. भेषज (खाने की औषधियाँ), 2. क्षार (मस्सों पर क्षार लगाना), 3. अग्नि (मस्सों को अग्नि से जला देना) और 4 शस्त्र द्वारा ऑपरेशन करना या काट देना। उक्त तैल के लगाने से मांसांकुर सूखकर झड़ जाते हैं और क्षार, अग्नि तथा शस्त्रक्रिया की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। महर्षि खरनाद की संहिता आज दुर्भाग्य से अप्राप्य है। यह योग उसी संहिता का है। यह भी एक मलहम है। पिण्ड तैल मञ्जिष्ठासारिवासर्जयरष्टीसिक्थैः पलोन्मितैः ।। 146 ।। पिण्डाख्यं साधयेत्तैलमैरण्डं वातरक्तनुत्। मजीठ, सारिवा, राल, मुलेठी तथा मोम प्रत्येक एक-एक पल लेकर एरण्ड तैल 20 पल सिद्ध करें। इस तैल का नाम 'पिण्ड तैल' है। इस तेल को लगाने से वातरक्त को नष्ट करता है। वक्तव्य-मोम के बिना प्रत्येक द्रव्य का कपड़छन चूर्ण बना लें और मोम को तैल में पिघलाकर सब द्रव्य मिला दें, एक प्रकार की 'मलहम' तैयार हो जायेगी। अर्थात् अन्यान्य तैलों के समान इस तैल का कल्क पृथक् नहीं किया जाता। अतएव उसका नाम 'पिण्ड तैल' है। अर्क तैल अर्कपत्ररसे पक्वं हरिद्राकल्कसंयुतम् ।। 147 ।। नाशयेत् सार्षपं तैलं पामां कच्छू विचर्चिकाम्। हल्दी के कल्क से युक्त तथा आक के पत्तों के रस में पका हुआ सरसों का तैल पामा (खुजली), कच्छू (अण्डकोष की खुजली और पामा का ही भयानक रूप) तथा विचर्चिका को नष्ट करता है। वक्तव्य-उक्त तैल परिभाषानुसार बना लेना चाहिये। सरसों का तैल 1 सेर, हल्दी का कल्क 1 पाव और आम के पत्तों का रस 4 सेर। मरिचादि तैल मरिचं हरितालं च त्रिवृतं रक्तचन्दनम् ।। 148 ।। मुस्तं मनःशिला मांसी द्वे निशे देवदारु च। विशाला करवीरं च कुष्ठमर्कपयस्तथा ।। 149 ।। तथैव गोमयरसं कुर्याति कर्षमितान् पृथक्। विषं चार्धपलं देयं प्रस्थं च कटुतैलकम् ।। 150 ।। गोमूत्रं द्विगुणं दद्याज्जलं च द्विगुणं भवेत्। मरिचाद्यमिदं तैलं सिद्धं कुष्ठहरं परम् ।। 151 ।। जयेत्कुष्ठानि सर्वाणि पुण्डरीकं विचर्चिकाम्। पामां श्वित्राणि रक्तं च कण्डूं कच्छूं प्रणाशयेत् ।। 152 ।। मरिच, हरिताल, निसोत, लालचन्दन, नागरमोथा, मैनसिल, जटामांसी, हल्दी, दारुहल्दी, देवदारु, इन्द्रायण की जड़, कनेर के पत्र, कूठ, मदार (आक) का दूध तथा गोबर का रस प्रत्येक द्रव्य एक-एक कर्ष तथा आवेष (मीठा तेलिया) 2 कर्ष लेकर कल्क बनायें तथा सरसों का तैल एक प्रस्थ (64 तोला), गोमूत्र दो प्रस्थ तथा जल दो प्रस्थ, सबको एक साथ मिलाकर विधिपूर्वक परिपाक करें। इस तैल का नाम 'मरिचादि तैल' है। इस तैल को लगाने से कुष्ठ के घावों को नष्ट कर सब प्रकार के कुष्ठों को जीतता है तथा पुण्डरीक नामक कुष्ठ, विचर्चिका स्राव युक्त खुजली, पामा, श्वेत दाग (फुलबहरी), रक्तविकार, खुजली तथा कच्छू को नष्ट करता है। CC-0. JK Sanskrit Academy, Jammu. Digitized by S3 Foundation USA