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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished699 pages

Page 127 of 699

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Page 127

का० १, अ० ६, ब्रा० १, कं० १-११ शतपथब्राह्मण / १०६ निकालो। हमारा भी यज्ञ में भाग हो' ॥१॥ देवों ने न माना। देवों के न मानने पर ऋतुएँ असुरों के पास चली गईं जो अप्रिय तथा देवों के शत्रु और अहितकारी थे ॥२॥ उन (असुरों) ने ऐसी उन्नति की कि देवों ने भी सुना। जो असुर आगे-आगे जोतते- बोते जाते थे, पीछे से उसी को दूसरे असुर काटते और इकट्ठा करते जाते थे। इनके लिए मानो बिना जोते ही ओषधियाँ झट से पक जाती थीं (अर्थात् असुर ज्यों ही बोते थे त्यों ही बिना समय बीते फसल पक जाती थी। आगे-आगे बोते थे, पीछे-पीछे काटते थे क्योंकि ऋतुएँ उनके साथ थीं) ॥३॥ इससे देवों को चिन्ता हुई कि इस प्रकार शत्रु, शत्रु को हानि पहुँचावें यह तो छोटी बात है। परन्तु इसकी हद बढ़ गई। अब कोई ऐसा उपाय होना चाहिए जिससे इस प्रकार की अवस्था न रहे ॥४॥ उन्होंने कहा, 'पहले ऋतुओं को बुलावें।' कैसे ? 'पहले इनको यज्ञ में भाग दें' ॥५॥ अग्नि ने कहा, 'तुम पहले मुझको आहुति देते हो, अब मैं कहाँ जाऊँ?' उन्होंने कहा, 'हम तुमको तुम्हारे स्थान से नहीं हटायेंगे।' और क्योंकि ऋतुओं के बुलाने में अग्नि को उन्होंने उसकी जगह से नहीं हटाया, इसलिए अग्नि अच्युत है। जो पुरुष समझता है कि अग्नि अच्युत है वह अपने स्थान से च्युत नहीं होता ॥६॥ देवों ने अग्नि से कहा, 'जाओ और उन्हें यहाँ बुला लाओ।' अग्नि उनके पास गया और बोला, 'हे ऋतुओ, मैंने तुम्हारे लिए यज्ञ में भाग प्राप्त कर लिया।' उन्होंने पूछा, 'तुमने हमारा भाग हमारे लिए कैसे प्राप्त किया?' अग्नि ने उत्तर दिया, 'वे पहले तुम्हारे लिए आहुति देंगे' ॥७॥ ऋतुओं ने अग्नि से कहा, 'हम तुमको अपने साथ यज्ञ में भाग देंगे, क्योंकि तुमने हमारे लिए यज्ञ में देवों के साथ भाग दिलाया है' और क्योंकि अग्नि को ऋतुओं के साथ-साथ आहुति मिली, इसलिए कहते हैं, 'समिधोऽअग्ने', 'तनूनपादग्ने', 'इडोऽअग्ने', 'बर्हिरग्ने', 'स्वाहाग्निम्'। जो इस रहस्य को समझता है उसका उस पुण्य कार्य में भाग होता है जो वह पुरुष करता है, जो अपने को उसके समान कहता है, क्योंकि वह अग्निमान् (अग्निवाला) है। अग्निमान् ऋतुएँ ही ओषधियों तथा अन्य पदार्थों को पकाती हैं ॥८॥ इस पर कुछ लोग आक्षेप करते हैं कि जब ये पिछले प्रयाज हैं तो पहले ही आहुतियाँ क्यों दी जाती हैं ? इसका उत्तर यह है कि इन प्रयाजों की कल्पना ही सबसे पीछे की थी, इसलिए ये पिछले प्रयाज हैं, और क्योंकि कहा कि हम पहले आहुति देंगे इसलिए पहले प्रयाज-आहुतियाँ दी गईं ॥९॥ देवों ने चौथे प्रयाज से यज्ञ को प्राप्त किया और पांचवें प्रयाज से उसकी स्थापना की। उसके बाद जो कुछ असंस्थित (बिना स्थापित हुआ) बच रहा, उसके द्वारा स्वर्गलोक को प्राप्त किया ॥१०॥ वे स्वर्गलोक को जाने लगे तो असुर और राक्षसों से डरे। उन्होंने अग्नि को अगुवा बनाया, क्योंकि वह राक्षसों को मारनेवाला और भगानेवाला है। उन्होंने अग्नि को मध्य में रक्खा क्योंकि अग्नि राक्षसों का मारनेवाला और भगानेवाला है। उन्होंने अग्नि को पीछे रक्खा, क्योंकि वह अग्नि राक्षसों को मारनेवाला और भगानेवाला है ॥११॥