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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished699 pages

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कां० १, अ० ६, ब्रा० ४, कं० ५-१५ शतपथब्राह्मण / १२७ अन्न है। और चूंकि इस रात को वह यहाँ साथ रहता है (अमा वसति) इसलिए इसका नाम अमावस्या है ॥५॥ उन्होंने इस (सोम) को गौओं द्वारा इकट्ठा करा-कराके तैयार किया। जो औषध खाई उस औषध से, और जो जल पिया उस जल से, उसी को बनाकर और तीव्र (तेज) करके उन्होंने (इन्द्र को) दिया ॥६॥ उस (इन्द्र) ने कहा, 'इससे मेरा पेट तो भर जाता है पर यह मुझे अच्छा नहीं लगता। ऐसा उपाय करो कि वह मुझे अच्छा लगने लगे। उन्होंने उसे औटे हुए (दूध) के द्वारा रुचिकर बना दिया ॥७॥ यद्यपि यह एक ही चीज है, दूध ही है और इन्द्र का ही है, फिर भी इसको नाना (अनेक) कहते हैं। चूंकि इन्द्र ने कहा 'धिनोति मे' (मेरा पेट भर जाता है) इसलिए इसका नाम हुआ 'दधि' और चूंकि इसमें 'श्रुत' अर्थात् औटा हुआ दूध मिलाया इसलिए उसको 'श्रुत' कहते हैं ॥८॥ जैसे सोम का डण्ठल मजबूत हो जाता है इसी प्रकार (इन्द्र भी) मजबूत हो गया और उसका रोगी हरापन जाता रहा । अमावस्या यज्ञ का यही महत्त्व है और जो कोई इस रहस्य को समझकर (अमावस्या के यज्ञ में दूध और दही) मिलाता है वह प्रजा और पशु से पूर्ण होता है। उसका दोष छूट जाता है। इसलिये उसको दूध और दधि मिलाना चाहिए ॥६॥ इस पर कुछ लोग आक्षेप करते हैं कि जो सोमयाजी न हो उसे सान्नाय्य आहुति न देनी चाहिए, क्योंकि सान्नाय्य हीसोम आहुति हैं। और जो सोमयाजी न हो उसको सोम आहुति देने का अधिकार नहीं। इसलिए जो सोमयाजी नहीं उसको सान्नाय्य आहुति नहीं देनी चाहिए ॥१०॥ परन्तु उसे सान्नाध्य आहुति देनी चाहिए। हमने इसी सम्बन्ध में सुना है कि इन्द्र ने कहा कि, 'इस समय मुझे सोम आहुति दे दो, फिर तुम मेरे लिए उस शक्ति देनेवाली वस्तु (सान्नाय्य आहुति) को तैयार करना। इससे मेरा पेट नहीं भरता। वह बनाओ जिससे मेरी सन्तुष्टि हो।' उस शक्ति देनेवाली वस्तु को उन्होंने अवश्य ही तैयार किया और इसलिए जो सोमयाजी नहीं हैं वे भी सान्नाय्य आहुति दें ॥११॥ पूर्णमास यज्ञ वृत्रघ्न अर्थात् इन्द्र के लिए है, क्योंकि इसी के द्वारा इन्द्र ने वृत्र को मारा। और अमावस्या यज्ञ भी वृत्रघ्न अर्थात् इन्द्र के लिए है, क्योंकि वह शक्ति देनेवाली चीज भी उन्होंने उसी के लिए तैयार की जिसने वृत्र को मारा ॥१२॥ यज्ञ जो पूर्णमास यज्ञ है वह वृत्रघ्न अर्थात् इन्द्र के लिए है। यह जो चन्द्रमा है वही वृत्र है। जब वह उस रात को न पूर्व में दीखता है, न पश्चिम में, तो इस यज्ञ के द्वारा (वह इन्द्र) इस सब (वृत्र) को मार डालता है, और उसका कुछ भी शेष नहीं रहने देता। जो इस रहस्य को जानता है वह सब पाप का नाश कर देता है, कुछ भी नहीं छोड़ता ॥१३॥ कुछ लोग (चौदस को) देखकर ही उपवास करते हैं कि कल (अमावस्या को यह चाँद) उदय न होगा। यह देवों का निश्चय करके दीखता हुआ भोजन है। (कल से) उनके लिए हम इसमें से देंगे। वह पुरुष वस्तुतः समृद्ध है जिसके पास अभी पुराना अन्न होता है और नया आ जाता है, क्योंकि उसके पास बहुत अन्न होता है। परन्तु वह इस समय सोमयाजी नहीं है; क्षीरयाजी है। इसी दूध का सोम राजा होता है ॥१४॥ इसलिए यह (दूध सोम से युक्त नहीं किन्तु) पूर्ववत् ही है क्योंकि (गायें) केवल ओषधि ही खाती हैं, केवल जल ही पीती हैं। इसलिए यह केवल दूध ही होता है (सोम नहीं); सोम तब होता जब अमावस्या के दिन चन्द्रमा वनस्पति और जलों में मिल जाता (ऊपर कह चुके हैं कि