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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished699 pages

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का० १, अ० ८, ब्रा० १, कं० ५-१३ शतपथब्राह्मण / १५३ जब वह उसको इस प्रकार पाल चुका तो उसे समुद्र में ले गया, और जिस वर्ष के लिए उसने कहा था उसी वर्ष उसी के कहने के अनुसार नाव बनाई । जब तूफान उठा तो वह नाव में बैठ गया । तब मछली उस तक तैर आई और उसके सींग से उसने नाव की रस्सी को बाँध दिया । इससे वह उत्तरी पहाड़ तक जल्दी से पहुँच गया ॥५॥ उसने कहा, 'मैंने तुझे बचा लिया । वृक्ष में नाव बाँध दे । परन्तु जब तू पहाड़ पर है उस समय ऐसा न होने दे कि जल तुझे काट दे । जब जल कम हो जाय तो नीचे उतर आना ।' अतः वह धीरे-धीरे उतरा । इसलिए उत्तरी पहाड़ के उस भाग को 'मनोरवसर्पणम्' अर्थात् 'मनु का उतार' कहते हैं। तूफान ने उस सब प्रजा को नष्ट कर दिया । केवल मनु बच रहा ॥६॥ उसने सन्तान की इच्छा से पूजा और श्रम किया । उस समय पाकयज्ञ भी किया और घी, दही, मट्ठा भी जलों में चढ़ाया । तब एक वर्ष में एक स्त्री उत्पन्न हुई । वह मोटी होकर निकली । उसके पैर में घी था । मित्र और वरुण उसे मिले ॥७॥ उन्होंने उससे पूछा, 'तू कौन है ?' उसने कहा, 'मनु की लड़की ।' उन्होंने कहा, 'कह कि तू हम दोनों की है ।' उसने कहा, 'नहीं, मैं उसी की हूँ जिसने मुझे जना है ।' उन्होंने उसमें भाग माँगा । उसने माना या न माना । वह वहाँ से चली आई और मनु के पास आई ॥८॥ मनु ने उससे पूछा, 'तू कौन है ?' 'तेरी लड़की ।' उसने पूछा, 'भगवति ! तू मेरी लड़की कैसे ?' उसने उत्तर दिया, 'तूने जलों में जो घी-मट्ठा अर्पण किया, उसी से तूने मुझे उत्पन्न किया । मैं आशी हूँ । तू मेरा प्रयोग कर । यदि तू यज्ञ में मेरा प्रयोग करेगा तो बहुत-से पशुओं और सन्तानवाला होगा । जो कुछ चीज तू मेरे द्वारा माँगेगा वह सब तुझको मिलेगी ।' अब उसने उसका यज्ञ के मध्य में प्रयोग किया, क्योंकि प्रयाज और अनुयाज के बीच में जो कुछ है वही यज्ञ का मध्य है ॥९॥ वह प्रजा की कामना से उसी के द्वारा पूजा और श्रम करता रहा । उसके द्वारा इस प्रजा को उत्पन्न किया, जो यह मनु की सन्तान है । जो कोई चीज उसके द्वारा माँगी वह सब उसको मिल गई ॥१०॥ निदान में यही इडा है । जो कोई इस रहस्य को समझकर 'इडा'-यज्ञ करता है वह इस प्रजा को जिसे मनु ने उत्पन्न किया बढ़ाता है, और जो कुछ चीज उसके द्वारा माँगता है, वही उसे मिल जाती है ॥११॥ इस (इडा) के पाँच भाग होते हैं । पशु ही इडा है । पशु के भी पाँच भाग होते हैं । इसलिए इडा के भी पाँच भाग होते हैं ॥१२॥ इडा के बराबर-बराबर टुकड़े करके और पुरोडाश के पूर्वार्द्ध को काटकर वह ध्रुवा