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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished699 pages

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कां० ४, अ० २, ब्रा० ४-५, कं० २१-२४ व १-३ शतपथब्राह्मण / ५७१ मिलकर चौबीस होते हैं। चौबीस अक्षरों की गायत्री होती है। यह उसका बछड़ा है। यह जो बछड़ों की रक्षा किया करते हैं वे दूध दुहने के लिए। इसकी रक्षा वे इसलिए करते हैं कि जैसे ये बछड़े दूध से सम्पन्न करते हैं इसी प्रकार यह गायत्री भी यजमान की सब कामनाओं को पूरा करे ॥२१॥ और अब अध्वर्यु और प्रतिप्रस्थाता (हविर्धान के बाहर) जाते हैं और फिर लौटते हैं तो मानो गाय अपने बछड़े के साथ लौट आई, इस प्रकार ये उस ग्रह के पास लौटते हैं। अध्वर्यु ग्रह को उँडेलता है। इस प्रकार वह गायत्री को छोड़ देता है। यह इस ग्रह को इसलिए उँडेलता है कि यह गायत्री यजमान के हवाले होकर उसकी सब कामनाओं की पूर्ति करे ॥२२॥ वह इस मन्त्र से उँडेलता है, "ध्रुवं ध्रुवेण॒ मन॑सा वा॒चा सो॒ममव॑नयामि" (यजु० ७।२५) —अर्थात् "ध्रुव ग्रह को दृढ़ मन और वाणी से सोम को उँडेलता हूँ" अर्थात् ग्रहण करता हूँ। “अथा॑ न ऽ इन्द्र॑ ऽ इद् विशोऽस॑प॒त्नाः स॒मन॑सस्करत्" (यजु० ७।२५)-"अब इन्द्र हमारे स्वजनों को शत्रु-रहित और एक मनवाला करे" ॥२३॥ अब इस (सोम में) से वह लेता है इस मन्त्र से, "मूर्द्धानं॑ दि॒वो ऽ अर॑तिं पृथि॒व्या वैश्वान॒र- मूत ऽ आ जा॒तम॒ग्निम् । क॒विँ सम्राज॒मति॑थिं॒ जना॑नामास॒न्ना पात्रं॑ जनयन्त दे॒वाः" (यजुर्वेद ७।२४) “उपयामगृहीतोऽसि ध्रुवोऽसि ध्रुवक्षितिर्ध्रुवाणां ध्रुवतमोऽच्युतानामच्युत क्षित्तम ऽएष ते योनिवैश्वानराय त्वा" (यजु० ७।२५) - "द्यौलोक के मूर्धा, पृथिवी के पोषक, वैश्वानर अग्नि को जो कवि, सम्राट्, लोगों का अतिथि है और जो ऋत अर्थात् यज्ञ में पैदा हुआ है, मुंह के पात्र के समान देवों ने उत्पन्न किया। तू आश्रय के लिए लिया गया है। तू दृढ़ है, दृढ़ घरवाला है, सबसे दृढ़ है। ठोसों में ठोस है। यह तेरी योनि है। वैश्वानर के लिए तुझको।" धूल को अलग करके और इस प्रकार कि तिनका भी न रहे वह इसको रख देता है, क्योंकि वह इसको वैश्वानर अग्नि के लिए लेता है ॥२४॥ विप्रुड्ढोमः अध्याय २—ब्राह्मण ५ ग्रहों को लेकर और (हविर्धान से) बाहर निकलकर (वेदी में पहुँचकर) विप्रुषों अर्थात् बूंदों का होम करता है। यह विप्रुषों का होम इसलिए करता है कि इस सोम की जो बूंदें गिर पड़ती हैं उनको वह आहवनीय में पहुँचा देता है। क्योंकि आहवनीय ही आहुतियों की प्रतिष्ठा है, इसलिए बूंदों की आहुति करता है ॥१॥ वह इस मन्त्र से आहुति देता है, “यस्ते॑ द्र॒प्स स्कन्द॑ति॒ यस्ते॑ ऽ अँ॒शुः" (यजु० ७।२६, ऋ० १०।१७।२) - "यह जो तेरा रस गिर पड़ता है, और यह जो तेरा खण्ड है।" यह जो थोड़ा खिंड जाता है उसको द्रप्स कहा, और खण्ड कहा उसके डण्ठल आदि टुकड़ों को। "ग्राव॑च्युतो धिष॒णयोरु॒पस्थात्" (यजु० ७।२६) -"पत्थर से कुचला हुआ और प्यालों में से निकला हुआ।" जब पत्थर पर पीसा जाता है तो वह प्यालों में से निकल भागता है अर्थात् खिंड जाता है। “अध्व॒र्योर्वा॒ परि॑ वा॒ यः प॒वित्रात्" (यजु० ७।२१) -"या तो अध्वर्यु के हाथ से या पवित्रे अर्थात् छन्ने से।" क्योंकि या तो अध्वर्यु के हाथ से या छन्ने से गिर पड़ता है। "तं ते॑ जुहोमि मन॑सा वषट्कृत॒ स्वाहा" (यजु० ७।२६) - "उसकी मैं मन से वषट्कार के साथ आहुति देता हूँ।" इस प्रकार यह उसकी वषट्कार-युक्त आहुति हो जाती है ॥२॥ अब अध्वर्यु छयी हुई वेदी से दो तिनके निकाल लेता है। दोनों अध्वर्यु यज्ञ के प्राण और उदान के स्वरूप में पहले जाते हैं। फिर प्रस्तोता यज्ञ की वाणी के रूप में, फिर उद्गाता यज्ञ के