शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)
Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda
by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)
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Read in contextकां० ४, अ० २-३, ब्रा० ५-१, कं० २०-२२ व १-८ शतपथब्राह्मण / ५७७ उष्णिक्, ककुभ् और अनुष्टुभ् के साथ ॥२०॥ गायत्री ही अकेली प्रातःसवन को ले जाती है—दो पंक्तियों के साथ अर्थात् स्तोत्र-पंक्ति और हविष्पंक्ति के साथ । आज्यस्तोत्र चार होते हैं और हविष्पवमान पाँचवाँ है । पंक्ति छन्द में पाँच पाद होते हैं। इस पंक्ति के साथ, न कि अकेली गायत्री प्रातःसवन को ले जाती है ॥२१॥ पुरोडाश इन्द्र का होता है। धान दो घोड़ों का, करम्भ पूषा का, दही सरस्वती का, पयस्या मित्र-वरुण की। पंक्ति में पाँच पद होते हैं। हवियों की इस पंक्ति के साथ, न कि अकेली, गायत्री प्रातःसवन को ले जाती है। इस पंक्ति को पूरा करने के लिए ही मैत्रावरुणी पयस्या प्रातःसवन में ही की जाती है, अन्य सवनों में नहीं ॥२२॥ ऋतुग्रहैन्द्राग्नवैश्वदेव ग्रहाः अध्याय ३—ब्राह्मण १ (सोम) पान करके और यह कहकर कि 'हम सबको साथ निमन्त्रण दिया गया था', अध्वर्यु उठ खड़ा होता है। जहाँ अच्छावाक अनुवाक पढ़ने को है वहाँ पुरोडाश के टुकड़े को ले जाकर और उसके हाथ में देकर कहता है, 'अच्छावाक, कह जो तुझको कहना है।' अच्छावाक का सोम से बहिष्कार हो चुका था ॥१॥ इन्द्र और अग्नि ने उसको प्रजा की उत्पत्ति के लिए बनाये रक्खा । इसलिए अच्छावाक इन्द्र-अग्नि का होता है। इस हवि के द्वारा, इस पुरोडाश के टुकड़े के द्वारा जिसको उसने हाथ में रक्खा है और उस ऋषि-वाणी के द्वारा (वेदमन्त्रों द्वारा) जिसको वह जपता है यह इन्द्र और अग्नि उसको बचाते हैं ॥२॥ अच्छावाक के बैठ जाने पर ऋतु-ग्रहों की आहुति देता है। अच्छावाक के बैठ जाने पर ऋतु-ग्रहों की आहुति इसलिए देता है कि अच्छावाक जोड़ा है, अच्छावाक इन्द्र और अग्नि का है। इन्द्र और अग्नि दो हैं। जोड़े का अर्थ है उत्पत्ति । वह इस उत्पत्ति करनेवाले जोड़े से ऋतुओं और संवत्सर को उत्पन्न करता है ॥३॥ अच्छावाक के बैठ चुकने पर ऋतु-ग्रहों की आहुति इसलिए भी देता है कि ऋतुयें 'सब' हैं, संवत्सर 'सब' है। इस प्रकार वह सबकी उत्पत्ति करता है। इसलिए वह अच्छावाक के बैठ चुकने पर ऋतु-ग्रहों की आहुति देता है ॥४॥ उसको बारह (ग्रह) लेने चाहिएँ । संवत्सर के १२ महीने होते हैं। इसलिए बारह ग्रह लेने चाहिएँ । तेरह भी ले सकता है, क्योंकि तेरहवाँ महीना भी होता है। परन्तु बारह ही लेने चाहिएँ । यही पूर्ण है ॥५॥ ये ग्रह द्रोण कलश से लिये जाते हैं। द्रोण कलश प्रजापति है। वह इसी प्रजापति से ऋतुओं और संवत्सर को उत्पन्न करता है ॥६॥ दो मुखवाले पात्रों से लेता है। दो मुखवाले पात्रों का अन्त कहाँ ? इसलिए यह अनन्त संवत्सर घूमा करता है। इसको लेकर रखता नहीं। इसलिए यह संवत्सर निरन्तर है ॥७॥ न अनुवाक कहता है। अनुवाक से तो निमन्त्रण दिया जाता है। यह ऋतु तो पहले से