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शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

शतपथ ब्राह्मण (शुक्ल यजुर्वेद - प्रथम भाग)

Shatapatha Brahmana Part 1 - Shukla Yajurveda

by महर्षि याज्ञवल्क्य / सायणभाष्य

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished699 pages

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कां० ४, अ० ५, ब्रा० ४, कं० ५-१४ शतपथब्राह्मण / ६४१ रहस्य को समझकर जिसके लिए ये ग्रह निकाले जाते हैं वह इन तेज, पराक्रमोंवाला हो जाता है ॥५॥ इनको प्रातःसवन में लेना चाहिए, आग्रयण ग्रह को लेने के पीछे। आग्रयण आत्मा है। अन्य इसके एक-एक करके अतिरिक्त अंग हैं जैसे क्लोम (फेफड़े) और हृदय तथा अन्य ॥६॥ या इन ग्रहों को दोपहर के सवन में पूतभृत् में से लेना चाहिए, उक्थ्य ग्रह को लेने के पीछे अथवा स्तोत्र पढ़ने के समय (उपाकरिष्यन्) । उक्थ्य इसका अनिरुक्त आत्मा है। परन्तु यह तो मीमांसा मात्र है। वस्तुतः इसको आग्रयण के पीछे प्रातःसवन में ही लेना चाहिए ॥७॥ माहेन्द्र ग्रह के पीछे इनकी आहुति दी जाती है। यह जो माहेन्द्र ग्रह है, इन्द्र का निष्के- वल्य (अकेला या अपना निज का) ग्रह है। इसी प्रकार स्तोत्र तथा शस्त्र भी इन्द्र के अपने निज के (निष्केवल्य हैं।) यजमान इन्द्र है, उसी के लिए ये ग्रह निकाले जाते हैं। इसलिए माहेन्द्र ग्रह के पीछे इनकी आहुति दी जाती है ॥८॥ इन ग्रहों को इस प्रकार निकालता है (पहला इस मंत्र से)-"अग्ने पवस्व स्वपा ऽ अस्मे वर्चः सुवीर्यम् । दधद्रयिं मयि पोषम् । उपयामगृहीतोऽस्यग्नये त्वा वर्चस ऽ एष ते योनिरग्नये त्वा वर्चसे" (यजु० ८।३८, ऋ० ६।६६।२१)- "हे अग्नि, अपने कार्य में दक्ष, तू पवित्र हो, मुझे तेज और पराक्रम दे। धन और पुष्टि दे। तू आश्रय के लिए लिया गया है अग्नि के लिए तुझे, तेज के लिए। यह तेरी योनि है। अग्नि के लिए तुझको, तेज के लिए तुझको" ॥९॥ दूसरा इस मंत्र से-"उत्तिष्ठन्नोजसा सह पीत्वी शिप्रे ऽ अवेपयः । सोममिन्द्र चमू सुतम् ।" उपयामगृहीतोऽसीन्द्राय त्वौ जस ऽ एष ते योनिरिन्द्राय त्वौजसे" (यजु० ८।३६, ऋ० ८।७६।१०) "हे इन्द्र ! अपने ओज के साथ ग्रह में निकाले हुए सोम को इस प्रकार पिया है कि ठोढ़ी आदि काँप गए हैं। तू आश्रय के लिए लिया गया है। तुझे इन्द्र के लिए ओज के साथ। यह तेरी योनि है। तुझे इन्द्र के लिए, ओज के लिए" ॥१०॥ तीसरा इस मंत्र से- "अदृश्रमस्य केतवो वि रश्मयो जनाँर ऽ अनु । भ्राजन्तो अग्नयो यथा । उपयामगृहीतोऽसि सूर्याय त्वा भ्राजायैष ते योनिः सूर्याय त्वा भ्राजाय" (यजु० ८।४०, ऋ० १।५०।३) - "जैसे तेजयुक्त अग्नियां दिखाई देती हैं उसी प्रकार इसके केतु और रश्मियां चमकें। तुझे आश्रय के लिए लिया गया। सूर्य के लिए तुझको, चमकनेवाले के लिए तुझको। यह तेरी योनि है। सूर्य के लिए तुझको, प्रकाश के लिए तुझको" ॥११॥ अब सोम-पान इस प्रकार है (पहला) - "अग्ने वर्चस्विन् वर्चस्वांस्त्वं देवेष्वसि वर्चस्वानहं मनुष्येषु भूयासम्" (यजु० ८।३८) - "हे वर्चस्वी अग्नि ! तू देवों में वर्चस्वी है। मैं मनुष्यों में वर्चस्वी हो जाऊं।" (दूसरा) - "इन्द्रौजस्वीञ्जिष्ठस्त्वं देवेष्वस्योजिष्ठोऽहं मनुष्येषु भूयासम्" (यजु० ८।३६) - "हे ओजवाले इन्द्र ! तू देवों में ओजवाला है। मैं मनुष्यों में ओजिष्ठ हो जाऊँ।" (तीसरा) - "सूर्य्य भ्राजिष्ठ भ्राजिष्ठस्त्वं देवेष्वसि भ्राजिष्ठोऽहं मनुष्येषु भूयासम्" (यजु० ८।४०) - "हे तेजयुक्त सूर्य ! तू देवों में तेजयुक्त है। मैं मनुष्यों में तेजयुक्त हो जाऊँ।" इस रहस्य को जाननेवाले जिस मनुष्य के लिए ये ग्रह निकाले जाते हैं उसके लिए ये ऋत्विज् उसमें तेज और पराक्रम की स्थापना करते हैं ॥१२॥ इनको पृष्ठ्य षडह (छः दिन षडह होता है) के पहले तीन दिनों में निकालना चाहिए, अर्थात् अग्नि का पहले दिन, इन्द्र का दूसरे दिन और सूर्य का तीसरे दिन। इस प्रकार एक-एक प्रतिदिन ॥१३॥ कुछ लोग इनको पिछले तीन दिन में निकालते हैं, परन्तु ऐसा न करना चाहिए। इनको पहले तीन दिन में ही निकालना चाहिए। यदि पिछले तीन दिनों में ही निकालने की इच्छा हो तो पहले इनको पहले तीन दिन में निकाल ले और फिर पिछले तीन दिन में। 'विश्वजित् सर्व- पृष्ठ' में ये तीनों ग्रह यथाक्रम एक ही दिन में निकाले जाते हैं ॥१४॥