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शिवमहिम्नः स्तोत्रम् (गन्धर्वराज पुष्पदन्त - सानुवाद सटीक)

शिवमहिम्नः स्तोत्रम् (गन्धर्वराज पुष्पदन्त - सानुवाद सटीक)

Shiva Mahimna Stotram with Hindi Commentary

by गन्धर्वराज पुष्पदन्त / आचार्य राजेश दीक्षित

DevanagariSanskritpublished35 pages

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भाषा-टीका-सहितम् ६ मुहुर्द्यौर्दौस्थ्यं यात्यनिभृतजटाताडिततटा । जगद्रक्षायै त्वं नटसि ननु वामैव विभुता ॥ १६ ॥ हे ईश ! आप जगत् की रक्षा के लिए राक्षसों को मोहित करके नाश के लिए नृत्य करते हो, तब भी संसार का आपके ताण्डव से दुःख दूर होता है, क्योंकि आपके चरणों के आघात से पृथ्वी धँसने लगती है, विशाल बाहुओं के संघर्ष से नक्षत्र आकाश पीड़ित हो जाता है तथा आपकी चंचल जटाओं से ताड़ित हुआ स्वर्ग लोक भी कम्पाय- मान हो जाता है । ठीक ही है, उपकार भी किसी के लिए अहितकारक हो जाता है ॥ १६ ॥ वियद्व्यापीतारागणगुणितफेनोद्गमरुचिः । प्रवाहो वारां यः पृषतलघुदृष्टः शिरसि ते ॥ जगद्द्दीपाकारं जलधिवलयं तेन कृतमि- त्यनेनैवोन्नेयं धृतमहिमदिव्यं तव वपुः ॥ १७ ॥ हे ईश ! तारा गणों की कान्ति से अत्यन्त शोभायमान आकाश में व्याप्त तथा भूलोक को चारों ओर से घेरकर जम्बू द्वीप बनाने वाली गङ्गा का जल-प्रवाह आपके जटाकपाट में बूँद से भी लघु देखा जाता है । इतने से ही आपके दिव्य तथा श्रेष्ठ शरीर की कल्पना की जा सकती है ॥ १७ ॥