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शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished850 pages

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Page 117
* विद्येश्वरसंहिता *१०३

और शूद्रोंको भी भगवान् शिवकी आज्ञाके अनुसार सदैव रुद्राक्ष धारण करना चाहिये।* यतियोंके लिये प्रणवके उच्चारणपूर्वक रुद्राक्षधारणका विधान है। जिसके ललाटमें त्रिपुण्ड्र लगा हो और सभी अंग रुद्राक्षसे विभूषित हों तथा जो मृत्युंजय-मन्त्रका जप कर रहा हो, उसका दर्शन करनेसे साक्षात् रुद्रके दर्शनका फल प्राप्त होता है।

पार्वती ! रुद्राक्ष अनेक प्रकारके बताये गये हैं। मैं उनके भेदोंका वर्णन करता हूँ। वे भेद भोग और मोक्षरूप फल देनेवाले हैं। तुम उत्तम भक्तिभावसे उनका परिचय सुनो। एक मुखवाला रुद्राक्ष साक्षात् शिवका स्वरूप है। वह भोग और मोक्षरूपी फल प्रदान करता है। जहाँ रुद्राक्षकी पूजा होती है, वहाँसे लक्ष्मी दूर नहीं जातीं। उस स्थानके सारे उपद्रव नष्ट हो जाते हैं तथा वहाँ रहनेवाले लोगोंकी सम्पूर्ण कामनाएँ पूर्ण होती हैं। दो मुखवाला रुद्राक्ष देवदेवेश्वर कहा गया है। वह सम्पूर्ण कामनाओं और फलोंको देनेवाला है। तीन मुखवाला रुद्राक्ष सदा साक्षात् साधनका फल देनेवाला है, उसके प्रभावसे सारी विद्याएँ प्रतिष्ठित होती हैं, चार मुखवाला रुद्राक्ष साक्षात् ब्रह्माका रूप है। वह दर्शन और स्पर्शसे शीघ्र ही धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—इन चारों पुरुषार्थोंको देनेवाला है। पाँच मुखवाला रुद्राक्ष साक्षात् कालाग्निरुद्ररूप है। वह सब कुछ करनेमें समर्थ है। सबको मुक्ति देनेवाला तथा सम्पूर्ण मनोवांछित फल प्रदान करनेवाला है। पंचमुख रुद्राक्ष समस्त पापोंको दूर कर देता है। छः मुखोंवाला रुद्राक्ष कार्तिकेयका स्वरूप है। यदि दाहिनी बाँहमें उसे धारण किया जाय तो धारण करनेवाला मनुष्य ब्रह्महत्या आदि पापोंसे मुक्त हो जाता है, इसमें संशय नहीं है। महेश्वरि! सात मुखवाला रुद्राक्ष अनंगस्वरूप और अनंग नामसे ही प्रसिद्ध है। देवेशि! उसको धारण करनेसे दरिद्र भी ऐश्वर्यशाली हो जाता है। आठ मुखवाला रुद्राक्ष अष्टमूर्ति भैरवरूप है, उसको धारण करनेसे मनुष्य पूर्णायु होता है और मृत्युके पश्चात् शूलधारी शंकर हो जाता है। नौ मुखवाले रुद्राक्षको भैरव तथा कपिल-मुनिका प्रतीक माना गया है अथवा नौ रूप धारण करनेवाली महेश्वरी दुर्गा उसकी अधिष्ठात्री देवी मानी गयी हैं। जो मनुष्य भक्तिपरायण हो अपने बायें हाथमें नवमुख रुद्राक्षको धारण करता है, वह निश्चय ही मेरे समान सर्वेश्वर हो जाता है—इसमें संशय नहीं है। महेश्वरि! दस मुखवाला रुद्राक्ष साक्षात् भगवान् विष्णुका रूप है। देवेशि! उसको धारण करनेसे मनुष्यकी सम्पूर्ण कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं। परमेश्वरि! ग्यारह मुखवाला जो रुद्राक्ष है, वह रुद्ररूप है। उसको धारण करनेसे मनुष्य सर्वत्र विजयी होता है। बारह मुखवाले रुद्राक्षको केशप्रदेशमें धारण करे। उसके धारण करनेसे मानो मस्तकपर बारहों आदित्य विराजमान हो जाते हैं। तेरह मुखवाला रुद्राक्ष विश्वेदेवोंका स्वरूप है। उसको धारण


* सर्वाश्रमाणां वर्णानां स्त्रीशूद्राणां शिवाज्ञया। धार्याः सदैव रुद्राक्षा $\times\quad\times\quad\times\quad\times$ ॥
(शि० पु० वि० २५। ४७)