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शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished850 pages

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Page 150

१३६ * संक्षिप्त शिवपुराण *

भावसे विभोर हो इस प्रकार प्रार्थना करे—
शिवे भक्तिः शिवे भक्तिः शिवे भक्तिर्भवे भवे।
अन्यथा शरणं नास्ति त्वमेव शरणं मम॥

'प्रत्येक जन्ममें मेरी शिवमें भक्ति हो, शिवमें भक्ति हो, शिवमें भक्ति हो। शिवके सिवा दूसरा कोई मुझे शरण देनेवाला नहीं। महादेव ! आप ही मेरे लिये शरणदाता हैं।'

इस प्रकार प्रार्थना करके सम्पूर्ण सिद्धियोंके दाता देवेश्वर शिवका पराभक्तिके द्वारा पूजन करे। विशेषतः गलेकी आवाजसे भगवान्‌को संतुष्ट करे। फिर सपरिवार नमस्कार करके अनुपम प्रसन्नताका अनुभव करते हुए समस्त लौकिक कार्य सुखपूर्वक करता रहे।

जो इस प्रकार शिवभक्तिपरायण हो प्रतिदिन पूजन करता है, उसे अवश्य ही पग-पगपर सब प्रकारकी सिद्धि प्राप्त होती है। वह उत्तम वक्ता होता है तथा उसे मनोवांछित फलकी निश्चय ही प्राप्ति होती है। रोग, दुःख, दूसरोंके निमित्तसे होनेवाला उद्वेग, कुटिलता तथा विष आदिके रूपमें जो-जो कष्ट उपस्थित होता है, उसे कल्याणकारी परम शिव अवश्य नष्ट कर देते हैं। उस उपासकका कल्याण होता है। भगवान् शंकरकी पूजासे उसमें अवश्य सद्गुणोंकी वृद्धि होती है—ठीक उसी तरह, जैसे शुक्लपक्षमें चन्द्रमा बढ़ते हैं। मुनिश्रेष्ठ नारद! इस प्रकार मैंने शिवकी पूजाका विधान बताया। अब तुम क्या सुनना चाहते हो? कौन-सा प्रश्न पूछनेवाले हो?

(अध्याय ११)
~~ ० ~~

भगवान् शिवकी श्रेष्ठता तथा उनके पूजनकी अनिवार्य आवश्यकताका प्रतिपादन

नारदजी बोले—ब्रह्मन्! प्रजापते! आप धन्य हैं; क्योंकि आपकी बुद्धि भगवान् शिवमें लगी हुई है। विधे! आप पुनः इसी विषयका सम्यक् प्रकारसे विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिये।

ब्रह्माजीने कहा—तात! एक समयकी बात है, मैं सब ओरसे ऋषियों तथा देवताओंको बुलाकर उन सबको क्षीरसागरके तटपर ले गया, जहाँ सबका हित-साधन करनेवाले भगवान् विष्णु निवास करते हैं। वहाँ देवताओंके पूछनेपर भगवान् विष्णुने सबके लिये शिवपूजनकी ही श्रेष्ठता बतलाकर यह कहा कि 'एक मुहूर्त या एक क्षण भी जो शिवका पूजन नहीं किया जाता, वही हानि है, वही महान्