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शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished850 pages

Page 155 of 850

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Page 155

*रुद्रसंहिता * १४१

नमस्कार करके भक्तिपरायण हो उसकी पूजा करे। उसकी पूजा हो जानेपर सभी देवता पूजित हो जाते हैं।

मिट्टीका शिवलिंग बनाकर विधिपूर्वक उसकी स्थापना करे। अपने घरमें रहनेवाले लोगोंको स्थापना-सम्बन्धी सभी नियमोंका सर्वथा पालन करना चाहिये। भूतशुद्धि एवं मातृकान्यास करके प्राणप्रतिष्ठा करे। शिवालयमें दिक्पालोंकी भी स्थापना करके उनकी पूजा करे। घरमें सदा मूलमन्त्रका प्रयोग करके शिवकी पूजा करनी चाहिये। वहाँ द्वारपालोंके पूजनका सर्वथा नियम नहीं है। भगवान् शिवके समीप ही अपने लिये आसनकी व्यवस्था करे। उस समय उत्तराभिमुख बैठकर फिर आचमन करे, उसके बाद दोनों हाथ जोड़कर तब प्राणायाम करे। प्राणायामकालमें मनुष्यको मूलमन्त्रकी दस आवृत्तियाँ करनी चाहिये। हाथोंसे पाँच मुद्राएँ दिखाये। यह पूजाका आवश्यक अंग है। इन मुद्राओंका प्रदर्शन करके ही मनुष्य पूजा-विधिका अनुसरण करे। तदनन्तर वहाँ दीप निवेदन करके गुरुको नमस्कार करे और पद्मासन या भद्रासन बाँधकर बैठे अथवा उत्तानासन या पर्यङ्कासनका आश्रय लेकर सुखपूर्वक बैठे और पुनः पूजनका प्रयोग करे। फिर अर्घ्यपात्रसे उत्तम शिवलिंगका प्रक्षालन करे। मनको भगवान् शिवसे अन्यत्र न ले जाकर पूजासामग्रीको अपने पास रखकर निम्नांकित मन्त्रसमूहसे महादेवजीका आवाहन करे।

आवाहन कैलासशिखरस्थं च पार्वतीपतिमुत्तमम् ॥ ४७॥ यथोक्तरूपिणं शम्भुं निर्गुणं गुणरूपिणम्। पञ्चवक्त्रं दशभुजं त्रिनेत्रं वृषभध्वजम् ॥ ४८ ॥ कर्पूरगौरं दिव्याङ्गं चन्द्रमौलिं कपर्दिनम्। व्याघ्रचर्मोत्तरीयं च गजचर्माम्बरं शुभम्॥ ४९ ॥ वासुक्यादिपरीताङ्गं पिनाकाद्यायुधान्वितम्। सिद्धयोऽष्टौ च यस्याग्रे नृत्यन्तीह निरन्तरम्॥ ५०॥ जयजयेति शब्दैश्च सेवितं भक्तपुञ्जकैः। तेजसा दुस्सहेनैव दुर्लक्ष्यं देवसेवितम् ॥ ५१ ॥ शरण्यं सर्वसत्त्वानां प्रसन्नमुखपङ्कजम्। वेदैः शास्त्रैर्यथागीतं विष्णुब्रह्मसुतं सदा॥ ५२॥ भक्तवत्सलमानन्दं शिवमावाहयाम्यहम्। (अध्याय १३)

‘जो कैलासके शिखरपर निवास करते हैं, पार्वतीदेवीके पति हैं, समस्त देवताओंसे उत्तम हैं, जिनके स्वरूपका शास्त्रोंमें यथावत् वर्णन किया गया है, जो निर्गुण होते हुए भी गुणरूप हैं, जिनके पाँच मुख, दस भुजाएँ और प्रत्येक मुखमण्डलमें तीन-तीन नेत्र हैं, जिनकी ध्वजापर वृषभका चिह्न अंकित है, अंगकान्ति कर्पूरके समान गौर है, जो दिव्यरूपधारी, चन्द्रमारूपी मुकुटसे सुशोभित तथा सिरपर जटाजूट धारण करनेवाले हैं, जो हाथीकी खाल पहनते और व्याघ्रचर्म ओढ़ते हैं, जिनका स्वरूप शुभ है, जिनके अंगोंमें वासुकि आदि नाग लिपटे रहते हैं, जो पिनाक आदि आयुध धारण करते हैं, जिनके आगे आठों सिद्धियाँ निरन्तर नृत्य करती रहती हैं, भक्तसमुदाय जय-जयकार करते हुए जिनकी सेवामें लगे रहते हैं, दुस्सह तेजके कारण जिनकी ओर देखना भी कठिन है, जो देवताओंसे सेवित तथा सम्पूर्ण प्राणियोंको शरण देनेवाले हैं, जिनका मुखारविन्द प्रसन्नतासे खिला हुआ है, वेदों और शास्त्रोंने जिनकी महिमाका यथावत् गान किया है, विष्णु और ब्रह्मा