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शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished850 pages

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Page 159

* रुद्रसंहिता * । १४५

चम्पा और केवड़ेको छोड़कर शेष सभी फूल भगवान् शिवको चढ़ाये जा सकते हैं।

विप्रवर! महादेवजीके ऊपर चावल चढ़ानेसे मनुष्योंकी लक्ष्मी बढ़ती है। ये चावल अखण्डित होने चाहिये और इन्हें उत्तम भक्तिभावसे शिवके ऊपर चढ़ाना चाहिये। रुद्रप्रधान मन्त्रसे पूजा करके भगवान् शिवके ऊपर बहुत सुन्दर वस्त्र चढ़ाये और उसीपर चावल रखकर समर्पित करे तो उत्तम है। भगवान् शिवके ऊपर गन्ध, पुष्प आदिके साथ एक श्रीफल चढ़ाकर धूप आदि निवेदन करे तो पूजाका पूरा-पूरा फल प्राप्त होता है। वहाँ शिवके समीप बारह ब्राह्मणोंको भोजन कराये। इससे मन्त्रपूर्वक सांगोपांग लक्ष पूजा सम्पन्न होती है। जहाँ सौ मन्त्र जपनेकी विधि हो, वहाँ एक सौ आठ मन्त्र जपनेका विधान किया गया है। तिलोंद्वारा शिवजीको एक लाख आहुतियाँ दी जायें अथवा एक लाख तिलोंसे शिवकी पूजा की जाय तो वह बड़े-बड़े पातकोंका नाश करनेवाली होती है। जौद्वारा की हुई शिवकी पूजा स्वर्गीय सुखकी वृद्धि करनेवाली है, ऐसा ऋषियोंका कथन है। गेहूँके बने हुए पकवानसे की हुई शंकरजीकी पूजा निश्चय ही बहुत उत्तम मानी गयी है। यदि उससे लाख बार पूजा हो तो उससे संतानकी वृद्धि होती है। यदि मूँगसे पूजा की जाय तो भगवान् शिव सुख प्रदान करते हैं। प्रियंगु (कँगनी)-द्वारा सर्वाध्यक्ष परमात्मा शिवका पूजन करनेमात्रसे उपासकके धर्म, अर्थ और काम-भोगकी वृद्धि होती है तथा वह पूजा समस्त सुखोंको देनेवाली होती है। अरहरके पत्तोंसे श्रृंगार करके भगवान् शिवकी पूजा करे। यह पूजा नाना प्रकारके सुखों और सम्पूर्ण फलोंको देनेवाली है। मुनिश्रेष्ठ! अब फूलोंकी लक्ष संख्याका तौल बताया जा रहा है। प्रसन्नतापूर्वक सुनो। सूक्ष्म मानका प्रदर्शन करनेवाले व्यासजीने एक प्रस्थ शंखपुष्पको एक लाख बताया है। ग्यारह प्रस्थ चमेलीके फूल हों तो वही एक लाख फूलोंका मान कहा गया है। जूहीके एक लाख फूलोंका भी वही मान है। राईके एक लाख फूलोंका मान साढ़े पाँच प्रस्थ है। उपासकको चाहिये कि वह निष्काम होकर मोक्षके लिये भगवान् शिवकी पूजा करे।

भक्तिभावसे विधिपूर्वक शिवकी पूजा करके भक्तोंको पीछे जलधारा समर्पित करनी चाहिये। ज्वरमें जो मनुष्य प्रलाप करने लगता है, उसकी शान्तिके लिये जलधारा शुभकारक बतायी गयी है। शतरुद्रिय मन्त्रसे, रुद्रीके ग्यारह पाठोंसे, रुद्रमन्त्रोंके जपसे, पुरुषसूक्तसे, छः ऋचावाले रुद्रसूक्तसे, महामृत्युंजय मन्त्रसे, गायत्री-मन्त्रसे अथवा शिवके शास्त्रोक्त नामोंके आदिमें प्रणव और अन्तमें 'नमः' पद जोड़कर बने हुए मन्त्रोंद्वारा जलधारा आदि अर्पित करनी चाहिये। सुख और संतानकी वृद्धिके लिये जलधाराद्वारा पूजन उत्तम बताया गया है। उत्तम भस्म धारण करके उपासकको प्रेमपूर्वक नाना प्रकारके शुभ एवं दिव्य द्रव्योंद्वारा शिवकी पूजा करनी चाहिये और शिवपर उनके सहस्त्रनाम मन्त्रोंसे घीकी धारा चढ़ानी चाहिये। ऐसा करनेपर वंशका विस्तार होता है, इसमें संशय नहीं है। इसी प्रकार यदि दस हजार मन्त्रोंद्वारा शिवजीकी पूजा की जाय तो प्रमेह