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शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished850 pages

Page 161 of 850

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Page 161

* रुद्रसंहिता * । १४७

ब्रह्मा बोले—(अर्थात् मैंने कहा—) महाभाग! आपने जो मुझपर कृपा की है, वह सर्वथा उचित ही है; क्योंकि भगवान् शंकरने मुझे आपके हाथोंमें सौंप दिया है। विष्णो! आपको नमस्कार है। आज मैं आपसे जो कुछ माँगता हूँ, उसे दीजिये। प्रभो! यह विराट् रूप चौबीस तत्त्वोंसे बना हुआ अण्ड किसी तरह चेतन नहीं हो रहा है, जडीभूत दिखायी देता है। हरे! इस समय भगवान् शिवकी कृपासे आप यहाँ प्रकट हुए हैं। अतः शंकरकी सृष्टि-शक्ति या विभूतिसे प्राप्त हुए इस अण्डमें चेतनता लाइये।

मेरे ऐसा कहनेपर शिवकी आज्ञामें तत्पर रहनेवाले महाविष्णुने अनन्तरूपका आश्रय ले उस अण्डमें प्रवेश किया। उस समय उन परम पुरुषके सहस्रों मस्तक, सहस्रों नेत्र और सहस्रों पैर थे। उन्होंने भूमिको सब ओरसे घेरकर उस अण्डको व्याप्त कर लिया। मेरे द्वारा भलीभाँति स्तुति की जानेपर जब श्रीविष्णुने उस अण्डमें प्रवेश किया, तब वह चौबीस तत्त्वोंका विकाररूप अण्ड सचेतन हो गया। पातालसे लेकर सत्यलोकतककी अवधिवाले उस अण्डके रूपमें वहाँ साक्षात् श्रीहरि ही विराजने लगे। उस विराट् अण्डमें व्यापक होनेसे ही वे प्रभु 'वैराज पुरुष' कहलाये। पंचमुख महादेवने केवल अपने रहनेके लिये सुरम्य कैलास-नगरका निर्माण किया, जो सब लोकोंसे ऊपर सुशोभित होता है। देवर्षे! सम्पूर्ण ब्रह्माण्डका नाश हो जानेपर भी वैकुण्ठ और कैलास—इन दो धामोंका यहाँ कभी नाश नहीं होता। मुनिश्रेष्ठ! मैं सत्यलोकका आश्रय लेकर रहता हूँ। तात! महादेवजीकी आज्ञासे ही मुझमें सृष्टि रचनेकी इच्छा उत्पन्न हुई है। बेटा! जब मैं सृष्टिकी इच्छासे चिन्तन करने लगा, उस समय पहले मुझसे अनजानमें ही पापपूर्ण तमोगुणी सृष्टिका प्रादुर्भाव हुआ, जिसे अविद्या-पंचक (अथवा पंचपर्वा अविद्या) कहते हैं। तदनन्तर प्रसन्नचित्त होकर शम्भुकी आज्ञासे मैं पुनः अनासक्त-भावसे सृष्टिका चिन्तन करने लगा। उस समय मेरे द्वारा स्थावर-संज्ञक वृक्ष आदिकी सृष्टि हुई, जिसे मुख्य-सर्ग कहते हैं। (यह पहला सर्ग है।) उसे देखकर तथा वह अपने लिये पुरुषार्थका साधक नहीं है, यह जानकर सृष्टिकी इच्छावाले मुझ ब्रह्मासे दूसरा सर्ग प्रकट हुआ, जो दुःखसे भरा हुआ है; उसका नाम है—तिर्यक्स्रोता*। वह सर्ग भी पुरुषार्थका साधक नहीं था। उसे भी पुरुषार्थ-साधनकी शक्तिसे रहित जान जब मैं पुनः सृष्टिका चिन्तन करने लगा, तब मुझसे शीघ्र ही तीसरे सात्त्विक सर्गका प्रादुर्भाव हुआ, जिसे 'ऊर्ध्वस्रोता' कहते हैं। यह देवसर्गके नामसे विख्यात हुआ। देवसर्ग सत्यवादी तथा अत्यन्त सुखदायक है। उसे भी पुरुषार्थसाधनकी रुचि एवं अधिकारसे रहित मानकर मैंने अन्य सर्गके लिये अपने स्वामी श्रीशिवका चिन्तन आरम्भ किया। तब भगवान् शंकरकी आज्ञासे एक रजोगुणी सृष्टिका प्रादुर्भाव


* पशु, पक्षी आदि तिर्यक्स्रोता कहलाते हैं। वायुकी भाँति तिरछा चलनेके कारण ये तिर्यक् अथवा 'तिर्यक्स्रोता' कहे गये हैं।