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शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished850 pages

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Page 801

* वायवीयसंहिता *
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वह मुख देखनेमें सौम्य है और मन्द मुसकानकी शोभासे उपासकोंके मनको मोहे लेता है। उनका पाँचवाँ मुख स्फटिकमणिके समान निर्मल, चन्द्रलेखासे समुज्ज्वल, अत्यन्त सौम्य तथा तीन प्रफुल्ल नेत्रकमलोंसे प्रकाशमान है।

भगवान् शिव अपने दाहिने हाथोंमें शूल, परशु, वज्र, खड्ग और अग्नि धारण करके उन सबकी प्रभासे प्रकाशित होते हैं तथा बायें हाथोंमें नाग, बाण, घण्टा, पाश तथा अंकुश उनकी शोभा बढ़ाते हैं। पैरोंसे लेकर घुटनोंतकका भाग निवृत्तिकलासे सम्बद्ध है। उससे ऊपर नाभितकका भाग प्रतिष्ठाकलासे, कण्ठतकका भाग विद्याकलासे, ललाटतकका भाग शान्ति-कलासे और उसके ऊपरका भाग शान्त्यतीताकलासे संयुक्त है। इस प्रकार वे पंचाध्वव्यापी तथा साक्षात् पंचकलामय शरीरधारी हैं। ईशानमन्त्र उनका मुकुट है। तत्पुरुषमन्त्र उन पुरातनदेवका मुख है। अघोरमन्त्र हृदय है। वामदेवमन्त्र उन महेश्वरका गुह्यभाग है और सद्योजातमन्त्र उनका युगल चरण है। उनकी मूर्ति अड़तीस कलामयी* है। परमेश्वर शिवका विग्रह मातृका-(वर्णमाला-) मय, पंचब्रह्म ('ईशानः सर्व-विद्यानाम्' इत्यादि पाँच मन्त्र) मय, प्रणवमय तथा हंसशक्तिसे सम्पन्न है। इच्छाशक्ति उनके अंकमें आरूढ़ है, ज्ञानशक्ति दक्षिण-भागमें है तथा क्रियाशक्ति वामभागमें विराजमान है। वे त्रितत्त्वमय हैं। अर्थात् आत्मतत्त्व, विद्यातत्त्व और शिवतत्त्व उनके स्वरूप हैं। वे सदाशिव साक्षात् विद्यामूर्ति हैं। इस प्रकार उनका ध्यान करना चाहिये।

मूलमन्त्रसे मूर्तिकी कल्पना और सकलीकरणकी क्रिया करके मूलमन्त्रसे ही यथोचित रीतिसे क्रमशः पाद्य आदि विशेषार्घ्यपर्यन्त पूजन करे। फिर पराशक्तिके साथ साक्षात् मूर्तिमान् शिवका पूर्वोक्त मूर्तिमें आवाहन करके सदसद्व्यक्तिरहित परमेश्वर महादेवका गन्धादि पंचोपचारोंसे पूजन करे। पाँच ब्रह्ममन्त्रोंसे, छः अंगमन्त्रोंसे, मातृकामन्त्रसे, प्रणवसे, शक्तियुक्त शिव-मन्त्रसे, शान्त तथा अन्य वेदमन्त्रोंसे अथवा केवल शिवमन्त्रसे उन परम देवका पूजन करे। पाद्यसे लेकर मुखशुद्धिपर्यन्त पूजन सम्पन्न करके इष्टदेवका विसर्जन किये बिना ही क्रमशः पाँच आवरणोंकी पूजा आरम्भ करे। (अध्याय २८-२९)


आवरणपूजाकी विस्तृत विधि तथा उक्त विधिसे पूजनकी महिमाका वर्णन

उपमन्यु कहते हैं—यदुनन्दन! पहले <u>शिवा और शिवके दायें और बायें भागमें</u> <u>क्रमशः गणेश और कार्तिकेयका गन्ध आदि पाँच उपचारोंद्वारा पूजन करे। फिर इन सबके</u>


* कला, काल, नियति, विद्या, राग, प्रकृति और गुण—ये सात तत्त्व, पंचभूत, पंचतन्मात्रा, दस इन्द्रियाँ, चार अन्तःकरण और पाँच शब्द आदि विषय—ये छत्तीस तत्त्व हैं। ये सब तत्त्व जीवके शरीरमें होते हैं। परमेश्वरके शरीरको शाक्त (शक्तिस्वरूप एवं चिन्मय) तथा मन्त्रमय बताया गया है। इन दो तत्त्वोंको जोड़ लेनेसे अड़तीस कलाएँ होती हैं। समस्त जड-चेतन परमेश्वरका स्वरूप होनेसे उनकी मूर्तिको अड़तीस कलामयी बताया गया है। अथवा पाँच स्वर और तैंतीस व्यंजनरूप होनेसे उनके शरीरको अड़तीस कलामय कहा गया है।

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