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शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished850 pages

Page 809 of 850

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Page 809

* वायवीयसंहिता * ७९५


पञ्चवक्त्रो दशभुजः शुद्धस्फटिकसंनिभः ॥ २० ॥
वर्णब्रह्मकलादेहो देवः सकलनिष्कलः ।
शिवमूर्त्तिसमारूढः शान्त्यतीतः सदाशिवः ।
भक्त्या मयार्चितो मह्यं प्रार्थितं शं प्रयच्छतु ॥ २१ ॥

प्रभो! आपके पाँच मुख और दस भुजाएँ हैं। आपकी अंगकान्ति शुद्ध स्फटिकमणिके समान निर्मल है। वर्ण, ब्रह्म और कला आपके विग्रहरूप हैं। आप सकल और निष्कल देवता हैं। शिव-मूर्त्तिमें सदा व्याप्त रहनेवाले हैं। शान्त्यतीत पदमें विराजमान सदाशिव आप ही हैं। मैंने भक्तिभावसे आपकी अर्चना की है। आप मुझे प्रार्थित कल्याण प्रदान करें॥ २०-२१॥

सदाशिवाङ्कमारूढा शक्तिरिच्छा शिवाह्वया ।
जननी सर्वलोकानां प्रयच्छतु मनोरथम् ॥ २२ ॥

सदाशिवके अंकमें आरूढ़, इच्छा-शक्तिस्वरूपा, सर्वलोकजननी शिवा मुझे मनोवांछित वस्तु प्रदान करें॥ २२॥

शिवयोर्दयितौ पुत्रौ देवौ हेरम्बषण्मुखौ ।
शिवानुभावौ सर्वज्ञौ शिवज्ञानामृताशिनौ ॥ २३ ॥
तृप्तौ परस्परं स्निग्धौ शिवाभ्यां नित्यसत्कृतौ ।
सत्कृतौ च सदा देवौ ब्रह्माद्यैस्त्रिदशैरपि ॥ २४ ॥
सर्वलोकपरित्राणं कर्तुमभ्युदितौ सदा ।
स्वेच्छावतारं कुर्वन्तौ स्वांशभेदैरनेकणः ॥ २५ ॥
ताविमौ शिवयोः पार्श्वे नित्यमित्थं मयार्चितौ ।
तयोराज्ञां पुरस्कृत्य प्रार्थितं मे प्रयच्छताम् ॥ २६ ॥

शिव और पार्वतीके प्रिय पुत्र, शिवके समान प्रभावशाली सर्वज्ञ तथा शिव-ज्ञानामृतका पान करके तृप्त रहनेवाले देवता गणेश और कार्तिकेय परस्पर स्नेह रखते हैं। शिवा और शिव दोनोंसे सत्कृत हैं तथा ब्रह्मा आदि देवता भी इन दोनों देवोंका सर्वथा सत्कार करते हैं। ये दोनों भाई निरन्तर सम्पूर्ण लोकोंकी रक्षा करनेके लिये उद्यत रहते हैं और अपने विभिन्न अंशोंद्वारा अनेक बार स्वेच्छापूर्वक अवतार धारण करते हैं। वे ही ये दोनों बन्धु शिव और शिवाके पार्श्वभागमें मेरे द्वारा इस प्रकार पूजित हो उन दोनोंकी आज्ञा ले प्रतिदिन मुझे प्रार्थित वस्तु प्रदान करें॥ २३—२६॥

शुद्धस्फटिकसंकाशमीशानाख्यं सदाशिवम् ।
मूर्द्धाभिमानिनी मूर्तिः शिवस्य परमात्मनः ॥ २७ ॥
शिवार्चनरतं शान्तं शान्त्यतीतं खमास्थितम् ।
पञ्चाक्षरन्तिमं बीजं कलाभिः पञ्चभिर्युतम् ॥ २८ ॥
प्रथमावरणे पूर्वं शक्त्या सह समर्चितम् ।
पवित्रं परमं ब्रह्म प्रार्थितं मे प्रयच्छतु ॥ २९ ॥

जो शुद्ध स्फटिकमणिके समान निर्मल, ईशान नामसे प्रसिद्ध और सदा कल्याणस्वरूप है, परमात्मा शिवकी मूर्धाभिमानिनी मूर्ति है; शिवार्चनमें रत, शान्त, शान्त्यतीतकलामें प्रतिष्ठित, आकाशमण्डलमें स्थित शिव-पञ्चाक्षरका अन्तिम बीजस्वरूप, पाँच कलाओंसे युक्त और प्रथम आवरणमें सबसे पहले शक्तिके साथ पूजित है, वह पवित्र परब्रह्म मुझे मेरी अभीष्ट वस्तु प्रदान करे॥ २७—२९॥

बालसूर्यप्रतीकाशं पुरुषाख्यं पुरातनम् ।
पूर्ववक्त्राभिमानं च शिवस्य परमेष्ठिनः ॥ ३० ॥
शान्त्यात्मकं मरुत्संस्थं शम्भोः पादार्चने रतम् ।
प्रथमं शिवबीजेषु कलासु च चतुष्कलम् ॥ ३१ ॥
पूर्वभागे मया भक्त्या शक्त्या सह समर्चितम् ।
पवित्रं परमं ब्रह्म प्रार्थितं मे प्रयच्छतु ॥ ३२ ॥

जो प्रातःकालके सूर्यकी भाँति अरुणप्रभासे युक्त, पुरातन, तत्पुरुष नामसे विख्यात, परमेष्ठी शिवके पूर्ववर्ती मुखका अभिमानी, शान्तिकलास्वरूप या शान्ति-कलामें प्रतिष्ठित, वायुमण्डलमें स्थित,