शिव पुराण
Shiva Purana
by महर्षि वेदव्यास
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Read in context८२० * संक्षिप्त शिवपुराण *
बाल्यावस्था, वृद्धावस्था, युवावस्था, नाना जातिका स्वरूप; पृथ्वी, जल, अग्नि और वायु—इन चार तत्त्वोंके शरीरको धारण करना, नित्य अपार्थिव एवं मनोहर गन्धको ग्रहण करना—ये पार्थिव ऐश्वर्यके आठ गुण बताये गये हैं।
जलमें निवास करना, पृथ्वीपर ही जलका निकल आना, इच्छा करते ही बिना किसी आतुरताके स्वयं समुद्रको भी पी जानेमें समर्थ होना, इस संसारमें जहाँ चाहे वहीं जलका दर्शन होना, घड़ा आदिके बिना हाथमें ही जलराशिको धारण करना, जिस विरस वस्तुको भी खानेकी इच्छा हो, उसका तत्काल सरस हो जाना, जल, तेज और वायु—इन तीन तत्त्वोंके शरीरको धारण करना तथा देहका फोड़े, फुंसी और घाव आदिसे रहित होना—पार्थिव ऐश्वर्यके आठ गुणोंको मिलाकर ये सोलह जलीय ऐश्वर्यके अद्भुत गुण हैं।
शरीरसे अग्निको प्रकट करना, अग्निके तापसे जलनेका भय दूर हो जाना, यदि इच्छा हो तो बिना किसी प्रयत्नके इस जगत्को जलाकर भस्म कर देनेकी शक्तिका होना, पानीके ऊपर अग्निको स्थापित कर देना, हाथमें आग धारण करना, सृष्टिको जलाकर फिर उसे ज्यों-का-त्यों कर देनेकी क्षमताका होना, मुखमें ही अन्न आदिको पचा लेना तथा तेज और वायु—दो ही तत्त्वोंसे शरीरको रच लेना—ये आठ गुण जलीय ऐश्वर्यके उपर्युक्त सोलह गुणोंके साथ चौबीस होते हैं। ये चौबीस तैजस ऐश्वर्यके गुण कहे गये हैं। मनके समान वेगशाली होना, प्राणियोंके भीतर क्षणभरमें प्रवेश कर जाना, बिना प्रयत्नके ही पर्वत आदिके महान् भारको उठा लेना, भारी हो जाना, हलका होना, हाथमें वायुको पकड़ लेना, अंगुलिके अग्रभागकी चोटसे भूमिको भी कम्पित कर देना, एकमात्र वायुतत्त्वसे ही शरीरका निर्माण कर लेना—ये आठ गुण तैजस ऐश्वर्यके चौबीस गुणोंके साथ बत्तीस हो जाते हैं। विद्वानोंने वायुसम्बन्धी ऐश्वर्यके ये ही बत्तीस गुण स्वीकार किये हैं। शरीरकी छायाका न होना, इन्द्रियोंका दिखायी न देना, आकाशमें इच्छानुसार विचरण करना, इन्द्रियोंके सम्पूर्ण विषयोंका समन्वय होना—आकाशको लाँघना, अपने शरीरमें उसका निवेश करना, आकाशको पिण्डकी भाँति ठोस बना देना और निराकार होना—ये आठ गुण अग्निके बत्तीस गुणोंसे मिलकर चालीस होते हैं। ये चालीस ही वायुसम्बन्धी ऐश्वर्यके गुण हैं। यही सम्पूर्ण इन्द्रियोंका ऐश्वर्य है, इसीको 'ऐन्द्र' एवं 'आम्बर' (आकाशसम्बन्धी) ऐश्वर्य भी कहते हैं।
इच्छानुसार सभी वस्तुओंकी उपलब्धि, जहाँ चाहे वहाँ निकल जाना, सबको अभिभूत कर लेना, सम्पूर्ण गुह्य अर्थका दर्शन होना, कर्मके अनुरूप निर्माण करना, सबको वशमें कर लेना, सदा प्रिय वस्तुका ही दर्शन होना और एक ही स्थानसे सम्पूर्ण संसारका दिखायी देना—ये आठ गुण पूर्वोक्त इन्द्रियसम्बन्धी ऐश्वर्य-गुणोंसे मिलकर अड़तालीस होते हैं। चान्द्रमस ऐश्वर्य इन अड़तालीस गुणोंसे युक्त कहा गया है। यह पहलेके ऐश्वर्योंसे अधिक गुणवाला है। इसे 'मानस ऐश्वर्य' भी कहते हैं। छेदना, पीटना, बाँधना, खोलना, संसारके वशमें रहनेवाले समस्त प्राणियोंको ग्रहण करना,