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शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished850 pages

Page 837 of 850

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Page 837

* वायवीयसंहिता * ८२३

कान्ति सुवर्णके समान है। उसमें क्रमशः 'व' से लेकर 'स' तकके चार अक्षर चार दलोंके रूपमें स्थित हैं। इन कमलोंमेंसे जिसमें ही अपना मन रमे, उसीमें महादेव और महादेवीका अपनी धीर बुद्धिसे चिन्तन करे। उनका स्वरूप अँगूठेके बराबर, निर्मल और सब ओरसे दीप्तिमान् है। अथवा वह शुद्ध दीपशिखाके समान आकारवाला है और अपनी शक्तिसे पूर्णतः मण्डित है। अथवा चन्द्रलेखा या ताराके समान रूपवाला है अथवा वह नीवारके सींक या कमलनालसे निकलेवाले सूतके समान है। कदम्बके गोलक या ओसके कणसे भी उसकी उपमा दी जा सकती है। वह रूप पृथिवी आदि तत्त्वोंपर विजय प्राप्त करनेवाला है। ध्यान करनेवाला पुरुष जिस तत्त्वपर विजय पानेकी इच्छा रखता हो, उसी तत्त्वके अधिपतिकी स्थूल मूर्तिका चिन्तन करे। ब्रह्मासे लेकर सदाशिवपर्यन्त तथा भव आदि आठ मूर्तियाँ ही शिवशास्त्रमें शिवकी स्थूल मूर्तियाँ निश्चित की गयी हैं। मुनीश्वरोंने उन्हें 'घोर', 'शान्त' और 'मिश्र' तीन प्रकारकी बताया है। फलकी आशा न रखनेवाले ध्यानकुशल पुरुषोंको इनका चिन्तन करना चाहिये। यदि घोर मूर्तियोंका चिन्तन किया जाय तो वे शीघ्र ही पाप और रोगका नाश करती हैं। मिश्र मूर्तियोंमें शिवका चिन्तन करनेपर चिरकालमें सिद्धि प्राप्त होती है और सौम्यमूर्तिमें शिवका ध्यान किया जाय तो सिद्धि प्राप्त होनेमें न तो अधिक शीघ्रता होती है और न अधिक विलम्ब ही। सौम्यमूर्तिमें ध्यान करनेसे विशेषतः मुक्ति, शान्ति एवं शुद्ध बुद्धि प्राप्त होती है। क्रमशः सभी सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं, इसमें संशय नहीं है।
(अध्याय ३८)


ध्यान और उसकी महिमा, योगधर्म तथा शिवयोगीका महत्त्व, शिवभक्त या शिवके लिये प्राण देने अथवा शिवक्षेत्रमें मरणसे तत्काल मोक्ष-लाभका कथन

उपमन्यु कहते हैं—श्रीकृष्ण! श्रीकण्ठनाथका स्मरण करनेवाले लोगोंके सम्पूर्ण मनोरथोंकी सिद्धि तत्काल हो जाती है, ऐसा जानकर कुछ योगी उनका ध्यान अवश्य करते हैं। कुछ लोग मनकी स्थिरताके लिये स्थूलरूपका ध्यान करते हैं। स्थूल-रूपके चिन्तनमें लगकर जब चित्त निश्चल हो जाता है, तब सूक्ष्मरूपमें वह स्थिर होता है। भगवान् शिवका चिन्तन करनेपर सब सिद्धियाँ प्रत्यक्ष सिद्ध हो जाती हैं। अन्य मूर्तियोंका ध्यान करनेपर भी शिवरूपका अवश्य चिन्तन करना चाहिये। जिस-जिस रूपमें मनकी स्थिरता लक्षित हो, उस-उसका बारंबार ध्यान करना चाहिये। ध्यान पहले सविषय होता है, फिर निर्विषय होता है—ऐसा ज्ञानी पुरुषोंका कथन है। इस विषयमें कुछ सत्पुरुषोंका मत है कि कोई भी ध्यान निर्विषय होता ही नहीं। बुद्धिकी ही कोई प्रवाहरूपा संतति 'ध्यान' कहलाती है, इसलिये निर्विषय बुद्धि

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