Skip to content
BharatKosha
शिव पुराण

शिव पुराण

Shiva Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished850 pages

Page 839 of 850

Read in context
Page 839
* वायवीयसंहिता *८२५

अन्धकारका नाश कर देता है, इसी तरह थोड़ा-सा योगाभ्यास भी महान् पापका विनाश कर डालता है। श्रद्धापूर्वक क्षणभर भी परमेश्वरका ध्यान करनेवाले पुरुषको जो महान् श्रेय प्राप्त होता है, उसका कहीं अन्त नहीं है।$^१$

ध्यानके समान कोई तीर्थ नहीं है, ध्यानके समान कोई तप नहीं है और ध्यानके समान कोई यज्ञ नहीं है; इसलिये ध्यान अवश्य करे।$^२$ अपने आत्मा एवं परमात्माका बोध प्राप्त करनेके कारण योगीजन केवल जलसे भरे हुए तीर्थों और पत्थर एवं मिट्टीकी बनी हुई देवमूर्तियोंका आश्रय नहीं लेते (वे आत्मतीर्थमें अवगाहन करते और आत्मदेवके ही भजनमें लगे रहते हैं)। जैसे अयोगी पुरुषोंको मिट्टी और काठ आदिकी बनी हुई स्थूल मूर्तियोंका प्रत्यक्ष होता है, उसी तरह योगियोंको ईश्वरके सूक्ष्म स्वरूपका प्रत्यक्ष दर्शन होता है। जैसे राजाको अपने अन्तःपुरमें विचरनेवाले स्वजन एवं परिजन प्रिय होते हैं और बाहरके लोग उतने प्रिय नहीं होते, उसी प्रकार भगवान् शंकरको अन्तःकरणमें ध्यान लगानेवाले भक्त ही अधिक प्रिय हैं, बाह्य उपचारोंका आश्रय लेनेवाले कर्मकाण्डी नहीं। जैसे लोकमें यह देखा गया है कि बाहरी लोग राजाके भवनमें राजकीय पुरुषोचित फलका उपभोग नहीं कर पाते, केवल अन्तःपुरके लोग ही उस फलके भागी होते हैं, उसी प्रकार यहाँ बाह्यकर्मी पुरुष उस फलको नहीं पाते, जो ध्यानयोगियोंको सुलभ होता है।

ज्ञानयोगकी साधनाके लिये उद्यत हुआ पुरुष यदि बीचमें ही मर जाय तो भी वह योगके लिये उद्योग करनेमात्रसे रुद्रलोकमें जायगा। वहाँ दिव्य सुखका उपभोग करके वह फिर योगियोंके कुलमें जन्म लेगा और पुनः ज्ञानयोगको पाकर संसारसागरको लाँघ जायगा। योगका जिज्ञासु पुरुष भी जिस गतिको पाता है, उसे यज्ञकर्ता सम्पूर्ण महायज्ञोंका अनुष्ठान करके भी नहीं पाता। करोड़ों वेदवेत्ता द्विजोंकी पूजा करनेसे जो फल मिलता है, वह एक शिवयोगीको भिक्षा देनेमात्रसे प्राप्त हो जाता है। यज्ञ, अग्निहोत्र, दान, तीर्थसेवन और होम—इन सभी पुण्यकर्मोंके अनुष्ठानसे जो फल मिलता है, वह सारा फल शिवयोगियोंको अन्न देनेमात्रसे प्राप्त हो जाता है। जो मूढ़ मानव शिवयोगियोंकी निन्दा करते हैं, वे श्रोताओंसहित नरकमें पड़ते हैं और प्रलयकालतक वहीं रहते हैं। श्रोताके होनेपर ही कोई शिवयोगियोंकी निन्दाका वक्ता हो सकता है, इसलिये महापुरुषोंके मतमें उस निन्दाको सुननेवाला भी महान् पापी और दण्डनीय है। जो लोग सदा भक्तिभावसे शिवयोगियोंकी सेवा करते हैं, वे महान्


१-यथा वह्निर्महादीप्तः शुष्कमाद्रं च निर्दहेत्। तथा शुभाशुभं कर्म ध्यानाग्निर्दहते क्षणात्॥
ध्यायतः क्षणमात्रं वा श्रद्धया परमेश्वरम्। यद्भवेत् सुमहच्छ्रेयस्तस्यान्तो नैव विद्यते॥
(शि० पु०, वा० सं०, उ० ख० ३९। २५, २७)
२-नास्ति ध्यानसमं तीर्थं नास्ति ध्यानसमं तपः। नास्ति ध्यानरूपो यज्ञस्तस्माद्ध्यानं समाचरेत्॥
(शि० पु०, वा० सं०, उ० ख० ३९। २८)