शिव संहिता (भगवान् शिव प्रणीत - हठयोग एवं राजयोग सटीक)
Shiva Samhita with Hindi Commentary
by भगवान् शिव / पं. मिहिरचन्द्र
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Read in contextपंचमपटलः । ( १७७ ) अनुष्ठान करते हैं वह सर्व पितृकुलको तारके परम गतिको लाभ करते हैं ॥ १७६ ॥ मूलम्-नित्यं नैमित्तिकं काम्यं प्रत्यहं यः समाचरेत्॥ मनसा चिन्तयित्वा तु सोऽक्ष- यं फलमाप्नुयात् ॥ १७७ ॥ टीका-उसी संगमस्थानमें जो साधक नित्य और नै- मित्तक और काम्य कर्मका अनुष्ठान सर्वदा मनसे चिन्त- नपूर्वक करते हैं सो अक्षय फललाभ करते हैं ॥ १७७ ॥ मूलम्-सकृद्यः कुरुते स्नानं स्वर्गे सौख्यं भु- नक्ति सः ॥ दग्ध्वा पापानशेषान्वै योगी शुद्धमतिः स्वयम्॥ १७८॥ अपवित्रः पवि- त्रो वा सर्वावस्थां गतोपि वा ॥ स्नानाचर- णमात्रेण पूतो भवति नान्यथा ॥ १७९ ॥ टीका-जो पवित्रमति योगी एकवार इस संगममें स्नान करते हैं वह सर्व पापको दग्धकरके स्वर्गका दिव्य भोग भोगते हैं और यह साधक पवित्र हो वा अपवित्र हो वा किसी अवस्थामें हो यह संगमके ध्यानरूपी स्नानमात्रसे निश्चय पवित्र होजायगा ॥ १७८॥ १७९॥ मूलम्-मृत्युकाले प्लुतं देहं त्रिवेण्याः सलि-