शिव सूत्र (क्षेमराज विमर्शिनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Shiva Sutras with Kshemaraja Vimarshini & Hindi Translation
by महर्षि वसुगुप्त / आचार्य क्षेमराज
Source: काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · काश्मीर शैव दर्शन ट्रस्ट · 1950 (origin)
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Read in contextभूमिका कश्मीर में त्रिक-शासन का आविर्भाव लगभग आठवीं शताब्दी (ई०) से माना जाता है । उपलब्ध शैव-ग्रन्थों के अनुसार त्रिक-शासन को शैव-शासन या शैवागम भी कहते हैं । यह शासन उतना ही प्राचीन माना गया है जितना वेद । सम्भवतः वेद- विस्तार के साथ ही शैवागम का भी आविर्भाव हुआ हो । अतः जैसे वेद अनादि माने जाते हैं वैसे ही शैवागम को भी अनादि मानना युक्ति-युक्त दीख पड़ता है । कश्मीर के त्रिक-शासन के अनुयायियों की भी यही धारणा है । उनके विश्वास तथा मान्यता के अनुसार शैवागम का इतिहास तन्त्रालोक तथा इसकी टीका के आधार पर इस प्रकार है— प्रथमतः परमशिव की परसंवित्तिरूपा परावाणी में समस्त शास्त्र परबोधरूपता से विकसित हुआ ही ठहरा रहता है, फिर पश्यन्ती दशा में अहंपरामर्शरूपता से ही उदय करता है— इस पश्यन्ती दशा में भी वाच्य-वाचकरूपता का भेद प्रतीत नहीं होता । तत्पश्चात् वही शास्त्र मध्यमा वाणी में अवतरित होकर अपने में ही वाच्य- वाचक भाव को प्रकट करके उदय करता है और अन्त में वही शास्त्र वैखरी दशा में आकर तथा वाच्य-वाचक भाव को प्रकट करके बाहर जगत् में अवतरित हो जाता है और स्फुटरूपता को प्राप्त होता है । शैवागम के अनुसार मुख्य रूप से यह शास्त्र पाँच प्रवाहों में प्रसारित होता है । यही पाँच प्रवाह शिव की पाँच शक्तियों का विकास है । ये पाँच शक्तियाँ चित्, आनन्द, इच्छा, ज्ञान और क्रिया कहलाती हैं । इनको क्रमशः ईशान, तत्पुरुष, सद्योजात, वामदेव और अघोरवक्त्र कहते हैं । इस प्रकार अगाध विश्वव्यापी शिव के पाँच मुखों से प्रवाहित हुई शैव-शास्त्र रूप सरिताएँ मूलतः बयानवे धाराओं में बह निकलीं । यह धाराएँ भिन्न-भिन्न प्रवृत्ति वाले जीवों की भिन्न-भिन्न आवश्यकताओं के अनुसार ही बहीं । ये ही अभेदरूप भैरव-शास्त्र, भेदाभेदरूप रुद्रशास्त्र और भेद-रूप शिवशास्त्र के रूप में प्रकट हुए । इस प्रकार ये सब शास्त्र तीन श्रेणियों में बाँटे जा सकते हैं— १. अभेद या अद्वैत—जगद्रूप नानाता में एकता के अनुभव का प्रत्यभिज्ञान । इन शास्त्रों को भैरव-शास्त्र कहते हैं । २. भेदाभेद—एकता और अनेकता के दोनों दृष्टिकोणों के अनुसार सिद्धान्तों का कथन । इन शास्त्रों को रुद्र-शास्त्र कहते हैं ।