श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
by महर्षि वाल्मीकि
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Read in context‘किंतु सती-साध्वी देवि! यदि आपके मनमें मेरे साथ चलनेका उत्साह नहीं है तो आप अपनी कोई पहचान ही दे दीजिये, जिससे श्रीरामचन्द्रजी यह जान लें कि मैंने आपका दर्शन किया है’॥ १० ॥
हनुमान्जीके ऐसा कहनेपर देवकन्याके समान तेजस्विनी सीता अश्रुगद्गदवाणीमें धीरे-धीरे इस प्रकार बोलीं—॥ ११ ॥
‘वानरश्रेष्ठ! तुम मेरे प्रियतमसे यह उत्तम पहचान बताना—‘नाथ! चित्रकूट पर्वतके उत्तर-पूर्ववाले भागपर, जो मन्दाकिनी नदीके समीप है तथा जहाँ फल-मूल और जलकी अधिकता है, उस सिद्धसेवित प्रदेशमें तापसाश्रमके भीतर जब मैं निवास करती थी, उन्हीं दिनों नाना प्रकारके फूलोंकी सुगन्धसे वासित उस आश्रमके उपवनोंमें जलविहार करके आप भीगे हुए आये और मेरी गोदमें बैठ गये॥ १२—१४ ॥
‘तदनन्तर (किसी दूसरे समय) एक मांसलोलुप कौआ आकर मुझपर चोंच मारने लगा। मैंने ढेला उठाकर उसे हटानेकी चेष्टा की, परंतु मुझे बार-बार चोंच मारकर वह कौआ वहीं कहीं छिप जाता था। उस बलिभोजी कौएको खानेकी इच्छा थी, इसलिये वह मेरा मांस नोचनेसे निवृत्त नहीं होता था॥ १५-१६ ॥
‘मैं उस पक्षीपर बहुत कुपित थी। अतः अपने लहँगेको दृढ़तापूर्वक कसनेके लिये कटिसूत्र (नारे)-को खींचने लगी। उस समय मेरा वस्त्र कुछ नीचे खिसक गया और उसी अवस्थामें आपने मुझे देख लिया॥ १७ ॥
‘देखकर आपने मेरी हँसी उड़ायी। इससे मैं पहले तो कुपित हुई और फिर लज्जित हो गयी। इतनेमें ही उस भक्ष्य-लोलुप कौएने फिर चोंच मारकर मुझे क्षतवि क्षत कर दिया और उसी अवस्थामें मैं आपके पास आयी॥ १८ ॥
‘आप वहाँ बैठे हुए थे। मैं उस कौएकी हरकतसे तंग आ गयी थी। अतः थककर आपकी गोदमें आ बैठी। उस समय मैं कुपित-सी हो रही थी और आपने प्रसन्न होकर मुझे सान्त्वना दी॥ १९ ॥
‘नाथ! कौएने मुझे कुपित कर दिया था। मेरे मुखपर आँसुओंकी धारा बह रही थी और मैं धीरे-धीरे आँखें पोंछ रही थी। आपने मेरी उस अवस्थाको लक्ष्य किया’॥
‘हनुमान्! मैं थक जानेके कारण उस दिन बहुत देरतक श्रीरघुनाथजीकी गोदमें सोयी रही। फिर उनकी बारी आयी और वे भरतके बड़े भाई मेरी गोदमें सिर रखकर सो रहे॥ २१ ॥