श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
by महर्षि वाल्मीकि
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Read in contextउस सेनामें कुछ रीछ थे और कुछ सिंहके समान पराक्रमी वानर। नख और दाँत ही उनके शस्त्र थे। वे सभी वानर सैनिक हाथों और पैरोंकी अंगुलियोंसे बड़ी धूल उड़ा रहे थे॥ ५६ ॥
उनकी उड़ायी हुई उस भयंकर धूलने सूर्यकी प्रभाको ढककर सम्पूर्ण जगत्को छिपा-सा दिया। वह भयानक वानरसेना पर्वत, वन और आकाशसहित दक्षिण दिशाको आच्छादित-सी करती हुई उसी तरह आगे बढ़ रही थी, जैसे मेघोंकी घटा आकाशको ढककर अग्रसर होती है॥ ५७१/२ ॥
वह वानरी सेना जब किसी नदीको पार करती थी, उस समय लगातार कई योजनोंतक उसकी समस्त धाराएँ उलटी बहने लगती थीं॥ ५८१/२ ॥
वह विशाल सेना निर्मल जलवाले सरोवर, वृक्षोंसे ढके हुए पर्वत, भूमिके समतल प्रदेश और फलोंसे भरे हुए वन—इन सभी स्थानोंके मध्यमें, इधर-उधर तथा ऊपर-नीचे सब ओरकी सारी भूमिको घेरकर चल रही थी॥ ५९-६०१/२ ॥
उस सेनाके सभी वानर प्रसन्नमुख तथा वायुके समान वेगवाले थे। रघुनाथजीकी कार्यसिद्धिके लिये उनका पराक्रम उबला पड़ता था॥ ६११/२ ॥
वे जवानीके जोश और अभिमानजनित दर्पके कारण रास्तेमें एक-दूसरेको उत्साह, पराक्रम तथा नाना प्रकारके बल-सम्बन्धी उत्कर्ष दिखा रहे थे॥ ६२१/२ ॥
उनमेंसे कोई तो बड़ी तेजीसे भूतलपर चलते थे और दूसरे उछलकर आकाशमें उड़ जाते थे। कितने ही वनवासी वानर किलकारियाँ भरते, पृथ्वीपर अपनी पूँछ फटकारते और पैर पटकते थे॥ ६३-६४ ॥
कितने ही अपनी बाँहें फैलाकर पर्वत-शिखरों और वृक्षोंको तोड़ डालते थे तथा पर्वतोंपर विचरनेवाले बहुतेरे वानर पहाड़ोंकी चोटियोंपर चढ़ जाते थे॥ ६५ ॥
कोई बड़े जोरसे गर्जते और कोई सिंहनाद करते थे। कितने ही अपनी जाँघोंके वेगसे अनेकानेक लता-समूहोंको मसल डालते थे॥ ६६ ॥
वे सभी वानर बड़े पराक्रमी थे। अँगड़ाई लेते हुए पत्थरकी चट्टानों और बड़े-बड़े वृक्षोंसे खेल करते थे। उन सहस्रों, लाखों और करोड़ों वानरोंसे घिरी हुई सारी पृथ्वी बड़ी शोभा पाती थी॥ ६७१/२ ॥