श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
by महर्षि वाल्मीकि
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Read in context‘ऐसा कहकर अत्यन्त दुर्जय राक्षसराज रावणने सीताके सुनते-सुनते एक राक्षसीसे कहा—॥ ३७॥
‘तुम क्रूरकर्मा राक्षस विद्युज्जिह्वको बुला ले आओ, जो स्वयं संग्रामभूमिसे रामका सिर यहाँ ले आया है’॥ ३८॥
तब विद्युज्जिह्व धनुषसहित उस मस्तकको लेकर आया और सिर झुका रावणको प्रणाम करके उसके सामने खड़ा हो गया। उस समय अपने पास खड़े हुए विशाल जिह्वावाले राक्षस विद्युज्जिह्वसे राजा रावण यों बोला—॥ ४०॥
‘तुम दशरथकुमार रामका मस्तक शीघ्र ही सीताके आगे रख दो, जिससे यह बेचारी अपने पतिकी अन्तिम अवस्थाका अच्छी तरह दर्शन कर ले’॥ ४१॥
रावणके ऐसा कहनेपर वह राक्षस उस सुन्दर मस्तकको सीताके निकट रखकर तत्काल अदृश्य हो गया॥ ४२॥
रावणने भी उस विशाल चमकीले धनुषको यह कहकर सीताके सामने डाल दिया कि यही रामका त्रिभुवनविख्यात धनुष है॥ ४३॥
फिर बोला—‘सीते! यही तुम्हारे रामका प्रत्यञ्चासहित धनुष है। रातके समय उस मनुष्यको मारकर प्रहस्त इस धनुषको यहाँ ले आया है’॥ ४४॥
जब विद्युज्जिह्वने मस्तक वहाँ रखा, उसके साथ ही रावणने वह धनुष पृथ्वीपर डाल दिया। तत्पश्चात् वह विदेहराजकुमारी यशस्विनी सीतासे बोला—‘अब तुम मेरे वशमें हो जाओ’॥ ४५॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके युद्धकाण्डमें इकतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ३१॥