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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

by महर्षि वाल्मीकि

DevanagariHindipublished2,621 pages

Page 2334 of 2621

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Page 2334

‘यह लोक तो यों ही भूख, प्यास और जरा आदिसे क्षीण हो रहा है तथा विषाद और शोकमें डूबकर अपनी विवेक-शक्ति खो बैठा है। दैवके मारे हुए इस मर्त्यलोकका तुम विनाश न करो॥ ११ ॥

‘महाबाहु राक्षसराज! देखो तो सही, यह मनुष्यलोक ज्ञानशून्य होनेके कारण मूढ़ होनेपर भी किस तरह नाना प्रकारके क्षुद्र पुरुषार्थोंमें आसक्त है? इसे इस बातका भी पता नहीं है कि कब दुःख और सुख आदि भोगनेका अवसर आयेगा?॥ १२ ॥

‘यहाँ कहीं कुछ मनुष्य तो आनन्दमग्न होकर गाजे-बाजे और नाच आदिका सेवन करते हैं—उनके द्वारा मन बहलाते हैं तथा कहीं कितने ही लोग दुःखसे पीड़ित हो नेत्रोंसे आँसू बहाते हुए रोते रहते हैं॥ १३ ॥

‘माता, पिता तथा पुत्रके स्नेहसे और पत्नी तथा भाऽइके सम्बन्धमें नाना प्रकारके मनसूबे बाँधनेके कारण यह मनुष्यलोक मोहग्रस्त हो परमार्थसे भ्रष्ट हो रहा है। इसे अपने बन्धनजनित क्लेशका अनुभव ही नहीं होता है॥ १४ ॥

‘इस प्रकार जो मोह (अज्ञान)-के कारण परम पुरुषार्थसे वञ्चित हो गया है, ऐसे मनुष्य-लोकको क्लेश पहुँचाकर तुम्हें क्या मिलेगा? सौम्य! तुमने मनुष्य-लोकको तो जीत ही लिया है, इसमें कोऽइ भी संशय नहीं है॥ १५ ॥

‘शत्रुनगरीपर विजय पानेवाले पुलस्त्यनन्दन! इन सब मनुष्योंको यमलोकमें अवश्य जाना पड़ता है। अतः यदि शक्ति हो तो तुम यमराजको अपने काबूमें करो। उन्हें जीत लेनेपर तुम सबको जीत सकते हो; इसमें संशय नहीं है’॥ १६ १/२ ॥

नारदजीके ऐसा कहनेपर लङ्कापति रावण अपने तेजसे उद्दीप्त होनेवाले उन देवर्षिको प्रणाम करके हँसता हुआ बोला—॥ १७ १/२ ॥

‘महर्षे! आप देवताओं और गन्धर्वोंके लोकमें विहार करनेवाले हैं। युद्धके दृश्य देखना आपको बहुत ही प्रिय है। मैं इस समय दिग्विजयके लिये रसातलमें जानेको उद्यत हूँ॥ १८ १/२ ॥

‘फिर तीनों लोकोंको जीतकर नागों और देवताओंको अपने वशमें करके अमृतकी प्राप्तिके लिये रसनिधि समुद्रका मन्थन करूँगा’॥ १९ १/२ ॥