श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
by महर्षि वाल्मीकि
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Read in contextदेवताओं तथा दानवोंके समीप यह आश्चर्यजनक घटना देखकर रोषावेशसे भरे हुए मृत्यु एवं कालको बड़ा हर्ष हुआ॥ २३ ॥
तत्पश्चात् मृत्युदेवने अत्यन्त कुपित होकर वैवस्वत यमसे कहा—‘आप मुझे छोड़िये—आज्ञा दीजिये, मैं समराङ्गणमें इस पापी राक्षसको अभी मारे डालता हूँ॥
‘महाराज! यह मेरी स्वभावसिद्ध मर्यादा है कि मुझसे भिड़कर यह राक्षस जीवित नहीं रह सकता। श्रीमान् हिरण्यकशिपु, नमुचि, शम्बर, निसन्दि, धूमकेतु, विरोचनकुमार बलि, शम्भु नामक दैत्य, महाराज वृत्र तथा बाणासुर, कितने ही शास्त्रवेत्ता राजर्षि, गन्धर्व, बड़े-बड़े नाग, ऋषि, सर्प, दैत्य, यक्ष, अप्सराओंके समुदाय, युगान्तकालमें समुद्रों, पर्वतों, सरिताओं और वृक्षोंसहित पृथ्वी—ये सब मेरे द्वारा क्षयको प्राप्त हुए हैं। ये तथा दूसरे बहुतेरे बलवान् एवं दुर्जय वीर भी मेरे द्वारा विनाशको प्राप्त हो चुके हैं, फिर यह निशाचर किस गिनतीमें है?॥ २५—२९ ॥
‘धर्मज्ञ! आप मुझे छोड़ दीजिये। मैं इसे अवश्य मार डालूँगा। जिसे मैं देख लूँ, वह कोई बलवान् होनेपर भी जीवित नहीं रह सकता॥ ३० ॥
‘काल! मेरी दृष्टि पड़नेपर वह रावण दो घड़ी भी जीवन धारण नहीं कर सकेगा। मेरे इस कथनका तात्पर्य केवल अपने बलको प्रकाशित करना मात्र नहीं है; अपितु यह स्वभावसिद्ध मर्यादा है’॥ ३१ ॥
‘मृत्युकी यह बात सुनकर प्रतापी धर्मराजने उससे कहा—‘तुम ठहरो, मैं ही इसे मारे डालता हूँ’॥ ३२ ॥
तदनन्तर क्रोधसे लाल आँखें करके सामर्थ्यशाली वैवस्वत यमने अपने अमोघ कालदण्डको हाथसे उठाया॥
उस कालदण्डके पार्श्वभागोंमें कालपाश प्रतिष्ठित थे और वज्र एवं अग्नितुल्य तेजस्वी मुद्गर भी मूर्तिमान् होकर स्थित था॥ ३४ ॥
वह कालदण्ड दृष्टिमें आनेमात्रसे प्राणियोंके प्राणोंका अपहरण कर लेता था। फिर जिससे उसका स्पर्श हो जाय अथवा जिसके ऊपर उसकी मार पड़े, उस पुरुषके प्राणोंका संहार करना उसके लिये कौन बड़ी बात है?॥ ३५ ॥
ज्वालाओंसे घिरा हुआ वह कालदण्ड उस राक्षसको दग्ध-सा कर देनेके लिये उद्यत था। बलवान् यमराजके हाथमें लिया हुआ वह महान् आयुध अपने तेजसे प्रकाशित हो उठा॥ ३६ ॥