श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण
Shrimad Valmiki Ramayana
by महर्षि वाल्मीकि
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Read in contextदशग्रीवके वशमें पड़ी हुईं वे शोकाकुल अबलाएँ सिंहके पंजेमें पड़ी हुईं हरिणियोंके समान दुःखी हो रही थीं। उनके मुख और नेत्रोंमें दीनता छा रही थी और उन सबकी अवस्था सोलह वर्षके लगभग थी॥ १० १/२ ॥
कोई सोचती थी, क्या यह राक्षस मुझे खा जायगा? कोई अत्यन्त दुःखसे आर्त हो इस चिन्तामें पड़ी थी कि क्या यह निशाचर मुझे मार डालेगा?॥ ११ १/२ ॥
वे स्त्रियाँ माता, पिता, भाई तथा पतिकी याद करके दुःखशोकमें डूब जातीं और एक साथ करुणाजनक विलाप करने लगती थीं॥ १२ १/२ ॥
‘हाय! मेरे बिना मेरा नन्हा-सा बेटा कैसे रहेगा। मेरी माँकी क्या दशा होगी और मेरे भाई कितने चिन्तित होंगे’ ऐसा कहकर वे शोकके सागरमें डूब जाती थीं॥
‘हाय! अपने उन पतिदेवसे बिछड़कर मैं क्या करूँगी? (कैसे रहूँगी)। हे मृत्युदेव! मेरी प्रार्थना है कि तुम प्रसन्न हो जाओ और मुझ दुखियाको इस लोकसे उठा ले चलो। हाय! पूर्व-जन्ममें दूसरे शरीरद्वारा हमने कौन-सा ऐसा पाप किया था, जिससे हम सब-की-सब दुःखसे पीड़ित हो शोकके समुद्रमें गिर पड़ी हैं। निश्चय ही इस समय हमें अपने इस दुःखका अन्त होता नहीं दिखायी देता॥ १४—१६॥
‘अहो! इस मनुष्यलोकको धिक्कार है! इससे बढ़कर अधम दूसरा कोई लोक नहीं होगा; क्योंकि यहाँ इस बलवान् रावणने हमारे दुर्बल पतियोंको उसी तरह नष्ट कर दिया, जैसे सूर्यदेव उदय लेनेके साथ ही नक्षत्रोंको अदृश्य कर देते हैं॥ १७ १/२ ॥
‘अहो! यह अत्यन्त बलवान् राक्षस वधके उपायोंमें ही आसक्त रहता है। अहो! यह पापी दुराचारके पथपर चलकर भी अपने-आपको धिक्कारता नहीं है॥ १८ १/२ ॥
‘इस दुरात्माका पराक्रम इसकी तपस्याके सर्वथा अनुरूप है, परंतु यह परायी स्त्रियोंके साथ जो बलात्कार कर रहा है, यह दुष्कर्म इसके योग्य कदापि नहीं है॥
‘यह नीच निशाचर परायी स्त्रियोंके साथ रमण करता है, इसलिये स्त्रीके कारण ही इस दुर्बुद्धि राक्षसका वध होगा’॥ २० १/२ ॥
उन श्रेष्ठ सती-साध्वी नारियोंने जब ऐसी बातें कह दीं, उस समय आकाशमें देवताओंकी दुन्दुभियाँ बज उठीं और वहाँ फूलोंकी वर्षा होने लगी॥ २१ १/२ ॥