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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

by महर्षि वाल्मीकि

DevanagariHindipublished2,621 pages

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Page 333

‘सौभाग्यसे मेरी सारी विघ्न-बाधाएँ पराजित हो गयीं। रघुकुलके महापुरुष महान् बलसे सम्पन्न और पराक्रममें सबसे श्रेष्ठ होते हैं। इस कुलके साथ सम्बन्ध होनेके कारण आज मेरे कुलका सम्मान बढ़ गया॥ ११ १/२ ॥

‘नरश्रेष्ठ नरेन्द्र! कल सबेरे इन सभी महर्षियोंके साथ उपस्थित हो मेरे यज्ञकी समाप्तिके बाद आप श्रीरामके विवाहका शुभकार्य सम्पन्न करें’॥ १२ १/२ ॥

ऋषियोंकी मण्डलीमें राजा जनककी यह बात सुनकर बोलनेकी कला जाननेवाले विद्वानोंमें श्रेष्ठ एवं वाक्यमर्मज्ञ महाराज दशरथने मिथिलानरेशको इस प्रकार उत्तर दिया—॥ १३ १/२ ॥

‘धर्मज्ञ! मैंने पहलेसे यह सुन रखा है कि प्रतिग्रह दाताके अधीन होता है। अतः आप जैसा कहेंगे, हम वैसा ही करेंगे’॥ १४ १/२ ॥

सत्यवादी राजा दशरथका वह धर्मानुकूल तथा यशोवर्धक वचन सुनकर विदेहराज जनकको बड़ा विस्मय हुआ॥ १५ १/२ ॥

तदनन्तर सभी महर्षि एक-दूसरेसे मिलकर बहुत प्रसन्न हुए और सबने बड़े सुखसे वह रात बितायी॥ १६ १/२ ॥

इधर महातेजस्वी श्रीराम विश्वामित्रजीको आगे करके लक्ष्मणके साथ पिताजीके पास गये और उनके चरणोंका स्पर्श किया॥ १७ १/२ ॥

राजा दशरथने भी जनकके द्वारा आदर-सत्कार पाकर बड़ी प्रसन्नताका अनुभव किया तथा अपने दोनों रघुकुल-रत्न पुत्रोंको सकुशल देखकर उन्हें अपार हर्ष हुआ। वे रातमें बड़े सुखसे वहाँ रहे॥ १८ १/२ ॥

महातेजस्वी तत्त्वज्ञ राजा जनकने भी धर्मके अनुसार यज्ञकार्य सम्पन्न किया तथा अपनी दोनों कन्याओंके लिये मंगलाचारका सम्पादन करके सुखसे वह रात्रि व्यतीत की॥ १९॥

इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके बालकाण्डमें उनहत्तरवाँ सर्ग पूरा हुआ॥ ६९॥