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श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

श्रीमद्वाल्मीकीय रामायण

Shrimad Valmiki Ramayana

by महर्षि वाल्मीकि

DevanagariHindipublished2,621 pages

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‘इस प्रकार शस्त्रका संयोग होनेके कारण पूर्वकालमें उन तपस्वी मुनिको ऐसी दुर्दशा भोगनी पड़ी। जैसे आगका संयोग ईंधनोंको जलानेका कारण होता है, उसी प्रकार शस्त्रोंका संयोग शस्त्रधारीके हृदयमें विकारका उत्पादक कहा गया है॥ २३ ॥

‘मेरे मनमें आपके प्रति जो स्नेह और विशेष आदर है, उसके कारण मैं आपको उस प्राचीन घटनाकी याद दिलाती हूँ तथा यह शिक्षा भी देती हूँ कि आपको धनुष लेकर किसी तरह बिना वैरके ही दण्डकारण्यवासी राक्षसोंके वधका विचार नहीं करना चाहिये। वीरवर! बिना अपराधके ही किसीको मारना संसारके लोग अच्छा नहीं समझेंगे॥ २४-२५ ॥

‘अपने मन और इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाले क्षत्रिय वीरोंके लिये वनमें धनुष धारण करनेका इतना ही प्रयोजन है कि वे संकटमें पड़े हुए प्राणियोंकी रक्षा करें॥ २६ ॥

‘कहाँ शस्त्र-धारण और कहाँ वनवास! कहाँ क्षत्रियका हिंसामय कठोर कर्म और कहाँ सब प्राणियोंपर दया करनारूप तप—ये परस्पर विरुद्ध जान पड़ते हैं। अतः हमलोगोंको देशधर्मका ही आदर करना चाहिये (इस समय हम तपोवनरूप देशमें निवास करते हैं, अतः यहाँके अहिंसामय धर्मका पालन करना ही हमारा कर्तव्य है)॥ २७ ॥

‘केवल शस्त्रका सेवन करनेसे मनुष्यकी बुद्धि कृपण पुरुषोंके समान कलुषित हो जाती है; अतः आप अयोध्यामें चलनेपर ही पुनः क्षात्रधर्मका अनुष्ठान कीजियेगा॥ २८ ॥

‘राज्य त्यागकर वनमें आ जानेपर यदि आप मुनिवृत्तिसे ही रहें तो इससे मेरी सास और श्वशुरको अक्षय प्रसन्नता होगी॥ २९ ॥

‘धर्मसे अर्थ प्राप्त होता है, धर्मसे सुखका उदय होता है और धर्मसे ही मनुष्य सब कुछ पा लेता है। इस संसारमें धर्म ही सार है॥ ३० ॥

‘चतुर मनुष्य भिन्न-भिन्न वानप्रस्थोचित नियमोंके द्वारा अपने शरीरको क्षीण करके यत्नपूर्वक धर्मका सम्पादन करते हैं; क्योंकि सुखदायक साधनसे सुखके हेतुभूत धर्मकी प्राप्ति नहीं होती है॥ ३१ ॥

‘सौम्य! प्रतिदिन शुद्धचित्त होकर तपोवनमें धर्मका अनुष्ठान कीजिये। त्रिलोकीमें जो कुछ भी है, आपको तो वह सब कुछ यथार्थरूपसे विदित ही है॥ ३२ ॥

‘मैंने नारीजातिकी स्वाभाविक चपलताके कारण ही आपकी सेवामें ये बातें निवेदन कर दी हैं। वास्तवमें आपको धर्मका उपदेश करनेमें कौन समर्थ है? आप इस विषयमें अपने छोटे