शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
by महर्षि शुक्राचार्य
Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)
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Read in contextतृतीयोऽध्यायः
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के लोगों के अथवा जिस समूह में हो उसके साथ प्रतिकूल आचरण करना एवं दरिद्रता ये सब मानहानि करनेवाले हैं अर्थात् इन सबों के होने से मानहानि होती है ।
व्याघ्राग्निसर्पहिंस्राणां नहि सङ्घर्षणं हितम् ॥ २५९ ॥
सेवितत्वात्तु राज्ञो नैते मित्राः कस्य सन्ति किम् ।
मैंने सेवा की है यह समझकर राजादि के साथ अधिक संघर्ष रखने का निषेध—'इन सबों की मैंने सेवा की है' इस साहस से राजा, व्याघ्र, अग्नि, सर्प तथा हिंसक पुरुष इनके साथ अधिक संघर्ष रखना हितकर नहीं होता है क्योंकि ये सब राजा-व्याघ्रादि क्या किसी के मित्र होते हैं ? अर्थात् किसी के मित्र नहीं होते हैं, इनको रुष्ट होते देर नहीं लगता है ।
दौर्मनस्यं च सुहृदां सुप्राबल्यं रिपोः सदा ॥ २६० ॥
विद्वत्स्वपि च दारिद्र्यं दारिद्र्ये बह्वपत्यता ।
धनिगुणि वैद्यनृपजलहीने सदा स्थितिः ॥ २६१ ॥
दुःखाय कन्यकाऽप्येका पित्रोरपि च याचनम् ।
**दुःखकारक कार्यों का निर्देश—**मित्रों या बन्धुओं का दुःखी होकर दिल फेर लेना, शत्रुओं की सदा प्रबलता, विद्वानों की दरिद्रता, दरिद्रता की अवस्था में बहुत सन्तान होना, धनिक, गुणी, वैद्य, राजा तथा जल से रहित देश में सदा निवास करना, माता-पिता के लिये एक भी कन्या का उत्पन्न होना और किसी से मांगना ये सब दुःखकारक होते हैं ।
सुरूपः सधनः स्वामी विद्वानपि बलाधिकः ॥ २६२ ॥
न कामयेद्यथेष्टं यत् स्त्रीणां नैव सुसौख्यकृत् ।
यो यथेष्टं कामयते स्त्री तस्य वशगा भवेत् ॥ २६३ ॥
**स्त्रियों को पति के प्रेम से ही अधिक सुख मानने का निर्देश—**पति भले ही सुन्दर स्वरूप, धन तथा विद्या से युक्त एवं अधिक बलशाली हो किन्तु यदि वह यथेष्ट प्रेम न करे तो स्त्रियों के लिये सुन्दर सुखकारक नहीं होता है अर्थात् स्त्रियां स्वामी के प्रेम से ही अधिक सुख मानती हैं ।
सन्धारणाल्लालनाच्च यथा याति वशं शिशुः ।
**स्त्री वशवर्तिनी बने इसके उपाय—**जैसे गोदी में उठाकर लेने और लाड़-प्यार करने से बच्चे वश में हो जाते हैं उसी भांति जो पति जिस स्त्री का यथेष्ट प्यार करता है वह स्त्री उसके वशीभूत हो जाती है ।
कार्यं तत्साधकादींश्च तद्व्ययं सुविनिर्गमम् ॥ २६४ ॥
विचिन्त्य कुरुते ज्ञानी नान्यथा लघ्वपि क्वचित् ।
व्यवसाय में साधन, व्यय, लाभ आदि का विचारकर प्रवृत्त होने का